रिटेल निवेशकों के लिए झटका या सुरक्षा? NSE का नया प्रस्ताव
भारत के शेयर बाज़ार में डेरिवेटिव्स यानी F&O सेगमेंट में ट्रेडिंग करने वालों के लिए एक बड़ी खबर है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के CEO आशीष चौहान ने कहा है कि अब इस सेगमेंट में एंट्री के लिए कड़े नियम बनाए जाएंगे, ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों में हैं। यह प्रस्ताव रिटेल निवेशकों के बढ़ते नुकसान को देखते हुए लाया गया है, जो कि चिंता का विषय बन गया है।
क्यों लाए जा रहे हैं सख्त नियम?
आंकड़े बताते हैं कि फाइनेंशियल ईयर (FY) 25 में लगभग 91% रिटेल ट्रेडर्स को डेरिवेटिव्स मार्केट में नुकसान हुआ। कुल नुकसान ₹1.06 लाख करोड़ से ज़्यादा रहा, जो पिछले साल यानी FY24 के ₹74,812 करोड़ के मुकाबले काफी ज़्यादा है। हर रिटेल ट्रेडर का औसत नुकसान FY25 में बढ़कर ₹1.1 लाख हो गया, जो पिछले साल से 27% ज़्यादा है। पिछले चार फाइनेंशियल ईयर (FY22 से FY25) में रिटेल निवेशकों को इक्विटी डेरिवेटिव्स में कुल मिलाकर लगभग ₹3 लाख करोड़ का घाटा हुआ है।
विदेशी बाज़ारों से सीख
CEO आशीष चौहान का प्रस्ताव अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों के नियमों से प्रेरित है। अमेरिका में 'पैटर्न डे ट्रेडर्स' के लिए कम से कम $25,000 का इक्विटी बैलेंस रखना ज़रूरी है। वहीं, सिंगापुर में मार्जिन ट्रेडिंग के लिए $25,000 की नेट लिक्विडेशन वैल्यू की ज़रूरत होती है और अकाउंट इक्विटी अक्सर डेबिट बैलेंस के 110% पर बनी रहनी चाहिए। भारत में फिलहाल F&O ट्रेडिंग के लिए ऐसे कोई स्पष्ट मिनिमम कैपिटल थ्रेशोल्ड (Minimum Capital Threshold) नहीं हैं।
STT हाइक और SEBI के कदम
इसी बीच, सरकार ने 1 फरवरी, 2026 को पेश किए गए बजट में सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में भी बढ़ोतरी की है। इक्विटी फ्यूचर्स पर STT बढ़कर 0.05% (पहले 0.02%) और ऑप्शंस प्रीमियम पर 0.15% (पहले 0.1%) कर दिया गया है। इससे ट्रेडिंग की लागत बढ़ गई है, खासकर हाई-फ्रीक्वेंसी रिटेल ट्रेडर्स के लिए। SEBI पहले ही वीकली एक्सपायरी को कम करने और कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाने जैसे कदम उठा चुका है, ताकि सट्टेबाजी पर लगाम लगाई जा सके।
क्या है चुनौतियाँ?
हालांकि, इस प्रस्ताव पर कुछ चिंताएं भी हैं। SEBI (सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया) ने F&O ट्रेडर्स के लिए सीधे तौर पर एग्जाम या सूटेबिलिटी क्राइटेरिया (Suitability Criteria) लागू करने में हिचकिचाहट दिखाई है। ऐसे सख्त नियम मार्केट लिक्विडिटी को कम कर सकते हैं, क्योंकि एक्टिव ट्रेडर्स और आर्बिट्रेजर्स की संख्या घट सकती है। मार्केट मैनिपुलेशन (Market Manipulation) के मामले भी चिंता का विषय बने हुए हैं।
आगे क्या?
अगर ये नियम लागू होते हैं, तो भारत के डेरिवेटिव्स मार्केट में रिटेल पार्टिसिपेशन का प्रोफाइल बदल सकता है। माना जा रहा है कि शुरुआती दौर में F&O वॉल्यूम में कुछ कमी आ सकती है। एसोसिएशन ऑफ नेशनल एक्सचेंजेस मेंबर्स ऑफ इंडिया (ANMI) भी SEBI के लिए सुझाव तैयार कर रही है, जिसमें एग्जाम या मॉनेटरी बैरियर (Monetary Barrier) जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। कुल मिलाकर, यह कदम बाज़ार को ज़्यादा रिस्क-मैनेज्ड और मैच्योर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।