Closing Auction Session: बाजार की क्लोजिंग में बढ़ी हलचल, एक्सpiry के दिन क्यों हो रही है भारी वोलेटिलिटी?

SEBIEXCHANGE
Whalesbook Logo
AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Closing Auction Session: बाजार की क्लोजिंग में बढ़ी हलचल, एक्सpiry के दिन क्यों हो रही है भारी वोलेटिलिटी?

अगस्त 2026 में शुरू हुए 15-मिनट के क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) ने मार्केट में हलचल मचा दी है। यह सिस्टम डेली प्राइस डिस्कवरी और मंथली डेरिवेटिव सेटलमेंट के दबाव को संभालने में संघर्ष कर रहा है, जिससे बाजार में अचानक और बड़े उतार-चढ़ाव देखे जा रहे हैं।

अगस्त 2026 में लागू किए गए इस नए क्लोजिंग ऑक्शन सेशन का मकसद पुराने VWAP सिस्टम को हटाकर पारदर्शी प्राइस डिस्कवरी सुनिश्चित करना था। लेकिन रोलआउट के महज एक महीने बाद ही यह सिस्टम भारी दबाव में है, खासकर मंथली डेरिवेटिव एक्सपायरी के दिनों में। यह विंडो 3:15 PM से 3:30 PM तक चलती है, और इसके बाद 3:35 PM तक रैंडम टाइम पर ट्रेड एग्जीक्यूट होते हैं।

प्राथमिकता का टकराव

समस्या तब शुरू होती है जब डेली प्राइस डिस्कवरी और डेरिवेटिव पोजीशन को खत्म करने का काम एक साथ आ जाता है। जहां वीकली इंडेक्स कॉन्ट्रैक्ट्स इस सिस्टम के साथ ढल गए हैं, वहीं मंथली एक्सपायरी - जिसमें शेयरों की फिजिकल डिलीवरी शामिल होती है - सिस्टम को परख रही है। हालिया एक्सपायरी दिनों में इस विंडो का टर्नओवर ₹446 करोड़ तक पहुंच गया, जबकि सामान्य दिनों में यह औसत ₹15 करोड़ के आसपास रहता है। इस भारी वॉल्यूम के कारण डेरिवेटिव प्रीमियम में जबरदस्त और अनिश्चित बदलाव (Erratic repricing) देखे जा रहे हैं।

रेगुलेटरी एक्शन और वोलेटिलिटी

बाजार का इस नए क्लोजिंग मैकेनिज्म के साथ तालमेल बिठाना आसान नहीं रहा है। हाल के दिनों में BSE Sensex जैसे बेंचमार्क इंडेक्स में 2,000 पॉइंट से भी ज्यादा की अनिश्चित हलचल देखी गई है। यह अस्थिरता इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स के लिए चिंता का विषय है क्योंकि म्यूचुअल फंड्स का NAV इसी क्लोजिंग प्राइस पर निर्भर करता है।

वहीं, मार्केट रेगुलेटर SEBI ने भी इस विंडो के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाया है। अगस्त 2026 में, रेगुलेटर ने दो एंटिटीज को प्रतिबंधित करते हुए उनके ₹3.68 करोड़ के अनुचित लाभ (Wrongful gains) को जब्त किया है। इन घटनाओं के बाद डेरिवेटिव टर्नओवर में गिरावट दर्ज की गई है, क्योंकि ट्रेडर्स आखिरी मिनटों के रिस्क से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

सुधार की जरूरत

एक्सपर्ट्स का मानना है कि मौजूदा सिस्टम को री-स्ट्रक्चर करने की जरूरत है। अमेरिका और यूके जैसे वैश्विक बाजारों में डेली प्राइसिंग और हाई-वॉल्यूम सेटलमेंट को अलग-अलग रखा जाता है। भारत में भी अगर मंथली डेरिवेटिव्स और डेली प्राइस डिस्कवरी के लिए अलग-अलग विंडो तय कर दी जाएं, तो क्लोजिंग प्राइस अधिक स्टेबल हो सकता है। फिलहाल, ट्रेडर्स को एक्सपायरी के अंतिम मिनटों में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है जब तक कि सिस्टम में सुधार न हो जाए।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.