भारत में सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग अब केवल कागजी खानापूर्ति नहीं रही, बल्कि डेटा-ड्रिवन जरूरत बन गई है। NIFTY 100 की करीब आधी कंपनियों द्वारा अपने पुराने आंकड़ों में बदलाव करने से निवेशकों के बीच डेटा की विश्वसनीयता को लेकर चिंता बढ़ गई है।
भारत में बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (BRSR) फ्रेमवर्क अब एक नए और महत्वपूर्ण मोड़ पर है। टॉप 1,000 लिस्टेड कंपनियों के लिए ESG (एनवायरमेंटल, सोशल और गवर्नेंस) डिस्क्लोजर अनिवार्य होने के बाद अब मार्केट की नजर डेटा की मात्रा से हटकर उसकी गुणवत्ता और तुलनात्मक सटीकता पर टिक गई है।\n\n### डेटा की विश्वसनीयता पर संकट\nनिवेशकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती पुरानी सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट के आंकड़ों का बार-बार बदलना है। KPMG के एक हालिया विश्लेषण के अनुसार, 94 में से 45 NIFTY 100 कंपनियों ने अपनी लेटेस्ट फाइलिंग्स में पिछले साल के आंकड़ों में बदलाव किया है। माप पद्धति (Measurement Methodology) में बदलाव के कारण आने वाले ये संशोधन निवेशकों के लिए लंबे समय के ट्रेंड्स को ट्रैक करना मुश्किल बना रहे हैं।\n\n### SEBI का कड़ा रुख\nइन चिंताओं को देखते हुए, SEBI अब 'BRSR Core' के जरिए सख्त मानक लागू कर रहा है, जिसमें प्रमुख ESG इंडिकेटर्स के लिए थर्ड-पार्टी एश्योरेंस अनिवार्य कर दिया गया है। यह नियम 2026-27 के फाइनेंशियल ईयर तक टॉप 1,000 कंपनियों पर लागू हो जाएगा। इसका उद्देश्य सस्टेनेबिलिटी रिपोर्ट को सिर्फ मार्केटिंग का जरिया बनने से रोकना और इसे एक वेरिफिएबल बिजनेस डिस्क्लोजर बनाना है।\n\n### निवेशकों के लिए जोखिम और संकेत\nशेयरधारकों के लिए रेगुलेटरी जोखिम भी बढ़ रहा है। गलत डिस्क्लोजर या 'ग्रीनवॉशिंग' (Greenwashing) के मामले में कंपनी पर भारी जुर्माना या ट्रेडिंग सस्पेंशन तक की कार्रवाई हो सकती है। आने वाली तिमाहियों में निवेशकों को इस बात पर ध्यान देना होगा कि कंपनियां अपनी सस्टेनेबिलिटी इन्वेस्टमेंट्स को कैसे मुनाफे और लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल मजबूती से जोड़ती हैं।
