2026 के शुरुआती नौ महीनों में भारतीय शेयर बाजार ने पिछले 15 सालों की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की है। BSE Sensex **14.7%** और NSE Nifty **13.1%** तक लुढ़क गए हैं। इसकी मुख्य वजह विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली और ग्लोबल अनिश्चितता है, जबकि Small-cap शेयरों ने मजबूती दिखाई है।
सितंबर का अंत भारतीय शेयर बाजार के लिए एक कठिन पड़ाव लेकर आया है। डेटा पर गौर करें तो BSE Sensex और NSE Nifty ने पिछले 15 वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की है। लार्ज-कैप शेयरों में साल भर जारी रही बिकवाली ने निवेशकों के पोर्टफोलियो पर भारी दबाव डाला है।
गिरावट की असली वजहें
इस बिकवाली के पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे बड़ी समस्या विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का लगातार पैसा निकालना है। वहीं, ग्लोबल स्तर पर बढ़ती बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की अस्थिर कीमतें और भू-राजनीतिक तनाव ने निवेशकों का रिस्क लेने का हौसला पस्त कर दिया है। लिक्विडिटी की कमी ने पूरे साल मुख्य इंडेक्स को दबाए रखा है।
बाजार का अलग चेहरा: मिड और स्मॉल-कैप
गिरावट के इस दौर में भी बाजार का एक हिस्सा अलग कहानी कह रहा है। Nifty Midcap 100 में सिर्फ 1.4% की मामूली गिरावट आई है, जबकि Nifty Smallcap 100 ने सबको हैरान करते हुए 9% की बढ़त दर्ज की है। यह साफ दिखाता है कि विदेशी पैसा लार्ज-कैप से बाहर निकल रहा है, लेकिन घरेलू निवेशकों की दिलचस्पी छोटे शेयरों में बरकरार है।
क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
पिछले 15 सालों में 4 बार ऐसे मौके आए हैं जब बाजार ने पहले नौ महीनों में लाल निशान दिखाया है। उनमें से 3 बार बाजार साल के अंत तक रिकवर करने में कामयाब रहा है, जैसे कि 2020 में हुआ था। हालांकि, 2015 का साल एक अपवाद था।
टेक्निकल चार्ट क्या कहते हैं?
फिलहाल टेक्निकल इंडिकेटर्स के मुताबिक, बाजार पर दबाव जारी है। विश्लेषकों का मानना है कि Sensex के लिए 72,200 और Nifty के लिए 22,600 पर सपोर्ट लेवल है। यदि विदेशी फंड फ्लो नहीं सुधरा, तो बाजार को 73,000 और 22,850 के स्तरों पर भारी रेजिस्टेंस का सामना करना पड़ सकता है।
