भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार को मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी (MTF) के तहत करीब **₹3,000 करोड़** का रिकॉर्ड लिक्विडेशन देखा गया। यह **2017** के बाद से एक दिन की सबसे बड़ी बिकवाली है, जो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और भू-राजनीतिक तनाव का नतीजा है।
शुक्रवार का दिन भारतीय निवेशकों के लिए एक बड़े सबक जैसा रहा। मार्केट में उथल-पुथल के बीच मार्जिन ट्रेडिंग करने वाले ट्रेडर्स को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। इस बिकवाली के चलते मार्केट का कुल आउटस्टैंडिंग फंडेड बुक वैल्यू घटकर ₹1.51 लाख करोड़ रह गया, जो पहले ₹1.54 लाख करोड़ था। यह गिरावट साल 2017 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
गिरावट की मुख्य वजह
बाजार की इस सुस्ती के पीछे वेस्ट एशिया में बढ़ता तनाव और ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की कीमतों में 2.8% का उछाल है, जो $111.7 प्रति बैरल तक पहुंच गया। अस्थिरता का आलम यह था कि Nifty 415 अंक की रेंज में झूलता रहा और अंत में 0.4% की गिरावट के साथ 22,600 पर बंद हुआ। हालांकि, विदेशी और घरेलू संस्थागत निवेशकों (FIIs/DIIs) ने ₹4,100 करोड़ से अधिक की खरीदारी की, लेकिन रिटेल निवेशकों द्वारा किए गए मार्जिन कॉल्स (Margin Calls) के दबाव ने मार्केट को संभाले नहीं दिया।
मार्जिन ट्रेडिंग और रिस्क का गणित
आमतौर पर ब्रोकर निवेशकों को उनकी पूंजी का 60% से 75% तक फंड उपलब्ध कराते हैं। जब शेयर की कीमतें गिरती हैं, तो ब्रोकर अपना पैसा सुरक्षित करने के लिए गिरवी रखे शेयरों को बेचना शुरू कर देते हैं। इसी चक्कर में HDFC Bank, Reliance Industries और Infosys जैसे दिग्गज शेयरों पर भारी बिकवाली का दबाव बना।
आगे की राह
हालांकि पिछले एक साल में MTF बुक 36% बढ़ी है, जिससे पता चलता है कि ट्रेडर्स में लीवरेज (Leverage) का चलन बढ़ रहा है। लेकिन, एक्सपर्ट्स का मानना है कि सिस्टेमैटिक रिस्क अभी भी काबू में है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) इस पूरी फंडिंग प्रक्रिया का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है, जहां 95% से ज्यादा लिक्विडेशन का दबाव देखा गया। निवेशकों को अब इस बात पर नजर रखनी होगी कि क्या ट्रेडर्स रिस्क कम कर रहे हैं, जो आने वाले समय में बाजार को स्थिर बना सकता है।
