साल 2026 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय सेकेंडरी मार्केट से **₹3 लाख करोड़** से ज्यादा की निकासी की है, लेकिन पैसा IPO मार्केट में तेजी से शिफ्ट हो रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2027 की पहली छमाही में कंपनियों ने IPO के जरिए **₹94,205 करोड़** जुटाए हैं, जो पिछले साल की तुलना में **35%** अधिक है।
भारतीय शेयर बाजार में इस समय एक गहरा अंतर देखने को मिल रहा है। सेकेंडरी मार्केट, यानी जहां पुरानी और स्थापित कंपनियां लिस्टेड हैं, वहां लंबे समय से बिकवाली का दबाव बना हुआ है। वहीं दूसरी ओर, IPO यानी प्राइमरी मार्केट में जबरदस्त हलचल है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) पुरानी इक्विटी से अपना पैसा निकालकर नई लिस्टिंग में सक्रिय रूप से लगा रहे हैं।
आंकड़ों में समझें बदलाव
FPIs की बिकवाली का आलम यह है कि 2026 में अब तक वे ₹3 लाख करोड़ से अधिक भारतीय बाजार से निकाल चुके हैं। केवल सितंबर 2026 में ही सेकेंडरी मार्केट से ₹35,861 करोड़ की निकासी हुई। इसके उलट, इसी दौरान निवेशकों ने नए IPOs में करीब ₹9,676 करोड़ का निवेश किया है।
वैल्युएशन का खेल
IPO के प्रति इस रुझान की बड़ी वजह वैल्युएशन का अंतर है। सेकेंडरी मार्केट की कई लार्ज-कैप कंपनियां अब बहुत महंगे भाव पर ट्रेड कर रही हैं, जिससे वहां कमाई की गुंजाइश कम बची है। इसके विपरीत, IPO में एक फिक्स्ड एंट्री पॉइंट मिलता है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच आए 67.2% मेनबोर्ड IPO अपने इश्यू प्राइस से ऊपर ट्रेड कर रहे हैं, जो निवेशकों का भरोसा बढ़ा रहा है।
मैक्रो दबाव और जोखिम
बाजार पर इस वक्त कच्चा तेल, भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका में बढ़ती बॉन्ड यील्ड का दबाव है। रुपया भी गिरकर ₹97 प्रति डॉलर के करीब पहुंच गया है। अगर सेकेंडरी मार्केट में मंदी का दौर लंबा खिंचा, तो यह IPO मार्केट के सेंटीमेंट को भी प्रभावित कर सकता है। अगर ग्लोबल लिक्विडिटी की स्थिति खराब होती है, तो IPO प्रीमियम खत्म होने का खतरा बना हुआ है, जिसके बाद निवेशकों को फिर से फंडामेंटल एनालिसिस की ओर लौटना पड़ेगा।
