शेयर बाजार में हलचल तेज है। **30** से ज्यादा कंपनियों को अपना IPO **30 सितंबर, 2026** तक लाना होगा, वरना उनका रेगुलेटरी अप्रूवल रद्द हो सकता है। यह डेडलाइन SEBI द्वारा दी गई मोहलत का आखिरी पड़ाव है।
रेगुलेटरी प्रेशर का दौर
भारतीय प्राइमरी मार्केट में इस वक्त अफरा-तफरी का माहौल है। 30 से अधिक कंपनियों के सामने 30 सितंबर, 2026 की समय सीमा खत्म हो रही है। अगर ये कंपनियां इस तारीख तक अपना IPO नहीं ला पाती हैं, तो उनका 'ऑब्जर्वेशन लेटर' (अप्रूवल) अमान्य हो जाएगा। इसका मतलब है कि उन्हें पूरा रेगुलेटरी प्रोसेस फिर से शुरू करना होगा, जिसमें दोबारा DRHP फाइल करना और लंबी कागजी कार्रवाई शामिल है। यह न सिर्फ महंगा है, बल्कि इसमें बहुत समय भी लगता है।
कंपनियों की दोहरी चुनौती
कंपनियों के पास सिर्फ रेगुलेटरी डेडलाइन ही नहीं, बल्कि फाइनेंशियल रिपोर्ट्स की भी चुनौती है। नियमों के मुताबिक, ऑफर डॉक्यूमेंट में 6 महीने से पुरानी फाइनेंशियल स्टेटमेंट का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इस वजह से कई कंपनियां दबाव में हैं। हालांकि, जिन कंपनियों में 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) ज्यादा है, वे अपना अप्रूवल एक्सपायर होने देना बेहतर समझ रही हैं ताकि वे बाजार में सही मौके का इंतजार कर सकें।
SEBI का राहत भरा कदम
इस भीड़ को कम करने के लिए SEBI ने थोड़ी लचीलापन बरती है। रेगुलेटर ने कंपनियों को IPO के साइज में 50% तक बदलाव करने की इजाजत दी है, ताकि वे मौजूदा बाजार मांग के अनुसार अपने इश्यू को रि-प्राइस कर सकें। निवेशकों के लिए सलाह है कि वे संख्या के बजाय कंपनी की क्वालिटी पर ध्यान दें। जल्दबाजी में लाए गए IPO में वैल्युएशन और बिजनेस मॉडल को लेकर बारीकी से जांच करना बेहद जरूरी है।
