भारत में कॉर्पोरेट बोर्ड्स पर AI रिस्क मैनेजमेंट फ्रेमवर्क को औपचारिक रूप देने का दबाव बढ़ गया है। Ministry of Corporate Affairs और Reserve Bank of India (RBI) के बदलते नियमों के बीच कंपनियों के लिए अब IT गवर्नेंस से आगे बढ़कर AI की निगरानी करना अनिवार्य हो गया है।
भारतीय कंपनियां अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को केवल IT विभाग का टूल नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण बिजनेस स्ट्रैटेजी मान रही हैं। अब रेगुलेटरी बॉडीज ने साफ कर दिया है कि भविष्य में एलगोरिदम बायस (Algorithmic Bias), डेटा प्राइवेसी और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी से जुड़ी किसी भी गड़बड़ी के लिए बोर्ड्स सीधे तौर पर जिम्मेदार होंगे।
बदलता रेगुलेटरी ढांचा
RBI पहले ही 'Master Direction on IT Governance' के जरिए बैंकों में बोर्ड-स्तरीय निगरानी अनिवार्य कर चुका है। जानकारों का मानना है कि अब Ministry of Corporate Affairs भी जल्द ही बोर्ड रिपोर्टिंग में डिजिटल रिस्क डिस्क्लोजर के नियमों को सख्त कर सकता है। जो कंपनियां अपनी तकनीकी प्रणालियों पर बेहतर कंट्रोल नहीं रखेंगी, उन्हें कानूनी और रेगुलेटरी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
गवर्नेंस और टैलेंट का गैप
फिलहाल, भारतीय कंपनियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती उनके बोर्ड का स्ट्रक्चर है। डेटा के मुताबिक, कई स्वतंत्र निदेशकों (Independent Directors) की औसत उम्र 64 वर्ष से अधिक है, जिनमें से कई बोर्ड्स में 'डिजिटल फ्लुएंसी' की कमी है। हालांकि ये सदस्य बिजनेस और फाइनेंस के माहिर हैं, लेकिन AI मॉडल्स की जटिलताओं को समझने के लिए उन्हें तकनीकी समझ की जरूरत है।
कंपनियां कैसे कर रही हैं बदलाव?
रिस्क को कम करने के लिए बड़ी कंपनियां नए स्ट्रक्चर्स अपना रही हैं:
- Reliance Industries: AI-संचालित रिस्क को मॉनिटर करने के लिए विशेष बोर्ड कमेटियों का गठन किया है।
- Accenture: कार्यकारी प्रोत्साहन (Executive Incentives) को AI के जिम्मेदार उपयोग से जोड़ा गया है।
- Cognizant: बोर्ड लेवल पर AI ओवरसाइट को औपचारिक रूप दिया गया है ताकि तकनीक का उपयोग बिजनेस स्ट्रैटेजी के साथ तालमेल बिठा सके।
निवेशकों को अब सिर्फ कंपनी के टेक्नोलॉजी खर्च पर ही नहीं, बल्कि उसके गवर्नेंस फ्रेमवर्क और 'टेक-सैवी' निदेशकों की नियुक्ति पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए।
