भारत सरकार ने सीमा साझा करने वाले पड़ोसी देशों से आने वाले छोटे विदेशी निवेश (FDI) के लिए नियमों को सरल कर दिया है। अब नॉन-कंट्रोलिंग स्टेक के लिए कागजी प्रक्रिया कम होगी, जिससे स्टार्टअप्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में पूंजी का प्रवाह बढ़ेगा।
भारत सरकार ने उन विदेशी निवेशकों के लिए नियमों को लचीला बनाया है जो सीमा साझा करने वाले पड़ोसी देशों से भारत में निवेश कर रहे हैं। अब तक छोटे निवेशों के लिए भी लंबी और जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था, जिसे सरकार ने 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देने के लिए कम करने का फैसला किया है।\n\n### क्या है बदलाव का मुख्य आधार?\n\nवर्ष 2020 में सरकार ने एक नियम लागू किया था जिसके तहत सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले हर निवेश के लिए अनिवार्य सरकारी मंजूरी जरूरी थी। अब इस अपडेट के जरिए उन निवेशकों को राहत दी गई है जो भारतीय कंपनियों में 10% से कम हिस्सेदारी (Stake) ले रहे हैं। इसका सीधा फायदा उन छोटी कंपनियों और स्टार्टअप्स को मिलेगा जो अक्सर फंडिंग के लिए लंबी फाइलिंग और जटिल अप्रूवल प्रक्रिया के कारण परेशान रहते थे।\n\n### सुरक्षा से कोई समझौता नहीं\n\nसरकार ने साफ किया है कि यह केवल एक प्रक्रियात्मक (Procedural) बदलाव है, न कि नीतिगत बदलाव। भारत अब भी अपनी सुरक्षा को लेकर सतर्क है। जो निवेशक बड़ी हिस्सेदारी या कंट्रोलिंग स्टेक खरीदना चाहते हैं, उनके लिए पुराने सख्त नियम पहले की तरह ही प्रभावी रहेंगे। सरकारी अधिकारी इसे एक प्रशासनिक सुधार के रूप में देख रहे हैं ताकि मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी पूंजी का प्रवाह तेज हो सके।\n\nअब सभी की निगाहें आधिकारिक नोटिफिकेशन पर टिकी हैं, जिससे यह साफ होगा कि किन दस्तावेजों में छूट दी गई है। आने वाली तिमाहियों में यह देखना अहम होगा कि क्या इस राहत के बाद निवेश प्रस्तावों के अप्रूवल में तेजी आती है या नहीं।
