साल 2026 में भारतीय कंपनियों ने IPO के जरिए ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा जुटाए हैं, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस रकम का 61% हिस्सा बिजनेस विस्तार के बजाय पुराने शेयरधारकों (Exiting Shareholders) को बाहर निकलने में जा रहा है।
भारतीय प्राइमरी मार्केट ने साल 2026 में ₹1 लाख करोड़ का बड़ा मुकाम हासिल किया है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे छिपी सच्चाई निवेशकों को सतर्क करने वाली है। जुटाए गए फंड का लगभग 61% हिस्सा बिजनेस बढ़ाने या नई फैक्ट्रियां लगाने में नहीं, बल्कि 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) के जरिए प्राइवेट इक्विटी और प्रमोटरों की जेब में जा रहा है। इसका मतलब साफ है कि पैसा कंपनी के ग्रोथ के लिए नहीं, बल्कि पुराने निवेशकों को एग्जिट दिलाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है।
संस्थागत निवेशकों की चाल (FPI Strategy)
फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) अपनी रणनीति बदल रहे हैं। सेकेंडरी मार्केट से ₹2.84 लाख करोड़ की बिकवाली करने के बावजूद, ये बड़े फंड नए IPO में जमकर निवेश कर रहे हैं। वे ओपन मार्केट के बजाय IPO के जरिए फिक्स्ड-प्राइस पर बड़े ब्लॉक्स उठा रहे हैं, ताकि महंगे शेयरों से निकलकर नई लिस्टिंग में सस्ता मौका तलाश सकें।
घटता लिस्टिंग गेन और सतर्क बाजार
एक समय था जब IPO लिस्टिंग के दिन औसतन 29% तक का उछाल आता था, लेकिन अब यह घटकर सिर्फ 7% रह गया है। उदाहरण के तौर पर, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) की लिस्टिंग को ही देखें, जहां वैल्यूएशन को लेकर काफी सावधानी बरती गई। यह मार्केट में अनुशासन आने का संकेत है कि अब निवेशक हर नए शेयर पर आँख मूंदकर दांव नहीं लगा रहे हैं।
आगे क्या होगा?
आने वाले समय में IPO की लाइन काफी लंबी है। करीब 160 कंपनियां SEBI से मंजूरी ले चुकी हैं और 75 कतार में हैं। हालांकि, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की ब्याज दरों की नीति पर नजर रखना जरूरी है। अगर दरें बढ़ती हैं, तो कंपनियों के लिए कर्ज महंगा होगा और वैल्यूएशन पर दबाव बढ़ेगा। इसलिए, IPO में पैसा लगाने से पहले प्रोस्पेक्टस जरूर पढ़ें और देखें कि पैसा बिजनेस ग्रोथ में लग रहा है या सिर्फ प्रमोटर का एग्जिट प्लान है।
