अगस्त 2026 में करीब **₹22,400 करोड़** के IPO बाजार में आए हैं। 30 सितंबर की रेगुलेटरी डेडलाइन के चलते कंपनियों में लिस्टिंग की होड़ मची है, लेकिन करीब **40%** हालिया IPO इश्यू प्राइस से नीचे ट्रेड कर रहे हैं।
भारतीय शेयर बाजार में फिलहाल नए IPOs की बहार आई हुई है। केवल अगस्त 2026 में ही कंपनियों ने ₹22,400 करोड़ से ज्यादा जुटाए हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह SEBI की रेगुलेटरी डेडलाइन है, जिसके तहत कई कंपनियों की मंजूरी की वैधता 30 सितंबर 2026 को खत्म हो रही है। इसी वजह से कंपनियां जल्दबाजी में बाजार में उतर रही हैं।
हालांकि, इस तेजी के पीछे बड़े रिस्क भी छिपे हैं। डेटा बताता है कि हाल के दिनों में लिस्ट हुई करीब 40% कंपनियां अपने इश्यू प्राइस से नीचे कारोबार कर रही हैं। रिटेल निवेशकों के लिए बड़ी चुनौती यह है कि नई कंपनियों का कोई पुराना ट्रैक रिकॉर्ड नहीं होता, जिससे उनका सही मूल्यांकन करना मुश्किल हो जाता है।
मुनाफे के आंकड़ों के पार देखें
IPO से पहले कंपनियां अपने फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स को बहुत आकर्षक दिखाती हैं। एक्सपर्ट्स की सलाह है कि सिर्फ क्वार्टरली प्रॉफिट पर भरोसा न करें। इसके बजाय, रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (RHP) में 'कैश फ्लो स्टेटमेंट' को ध्यान से देखें। अगर कंपनी का कोर बिजनेस कैश गंवा रहा है, तो यह एक बड़ा वार्निंग साइन है।
गवर्नेंस और कर्ज का जाल
निवेशकों को यह जरूर देखना चाहिए कि कंपनी के प्रमोटर्स कहीं बार-बार बिजनेस स्ट्रैटेजी तो नहीं बदल रहे? साथ ही, 'कंटिजेंट लायबिलिटीज' (Contingent Liabilities) वाले सेक्शन को जरूर पढ़ें। ये भविष्य के वे संभावित कर्ज या विवाद हैं, जो बैलेंस शीट पर सीधे नहीं दिखते लेकिन बाद में कंपनी पर भारी पड़ सकते हैं। साथ ही, डेली ऑपरेशंस के लिए शॉर्ट-टर्म डेट पर ज्यादा निर्भरता भी वर्किंग कैपिटल मैनेजमेंट में कमजोरी का संकेत है।
वैल्यूएशन और साथियों से तुलना
सिर्फ ग्रोथ देखकर निवेश करना सही नहीं है। देखें कि क्या प्रॉफिट की ग्रोथ रेवेन्यू से तेज है? अगर नहीं, तो कंपनी की कार्यक्षमता पर सवाल उठता है। कंपनियां अक्सर अपने पीयर्स (Peers) की लिस्ट में सिर्फ महंगी वैल्यूएशन वाली कंपनियों को रखती हैं ताकि अपना IPO सस्ता दिखे। ऐसे में हमेशा यह चेक करें कि क्या वाकई उनकी तुलना सही प्रतिस्पर्धियों से की गई है।
