National Biodiversity Authority के 'एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग' फ्रेमवर्क के तहत अब तक **₹278 करोड़** जमा किए गए हैं। चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में ही **₹9.68 करोड़** का योगदान आया है, जो बीज और कृषि कंपनियों के लिए एक अहम कंप्लायंस कॉस्ट बन गया है।
एग्रो सेक्टर पर असर
Biological Diversity Act के तहत आने वाली यह लेवी सीधे तौर पर उन कंपनियों को प्रभावित करती है जो जैविक संसाधनों (biological resources) का व्यावसायिक उपयोग करती हैं। चालू फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में हुए कुल कलेक्शन का 74% हिस्सा अकेले बीज और एग्रो-इनपुट सेक्टर से आया है। इस दायरे में East West Seeds India, Nunhems India, Bayer Science & Innovation, Syngenta India और Enza Zaden India जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं।
निवेशक क्यों दें ध्यान?
नियमों के अनुसार, जिन कंपनियों का सालाना टर्नओवर ₹5 करोड़ से ज्यादा है, उन्हें अपने उत्पादों की 'एक्स-फैक्ट्री सेलिंग प्राइस' का 0.2% से 0.6% हिस्सा लेवी के रूप में देना पड़ता है। यह एक फिक्स्ड ऑपरेटिंग एक्सपेंस है जो लंबी अवधि में कंपनियों के नेट प्रॉफिट मार्जिन पर असर डाल सकता है।
ट्रेसेबिलिटी और ESG की चुनौती
इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ी समस्या जैविक संपत्तियों की 'ट्रेसेबिलिटी' (traceability) है। जब कंपनियां खुले बाजार या बिचौलियों से कच्चा माल खरीदती हैं, तो सीधे तौर पर मूल किसानों से जुड़ाव खत्म हो जाता है। इस कारण नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी (NBA) जमा राशि को व्यक्तिगत किसानों के बजाय राज्य-स्तरीय बोर्डों को ट्रांसफर करती है। निवेशकों के लिए यह स्थिति ESG (Environmental, Social, and Governance) रिपोर्टिंग के नजरिए से अनिश्चितता पैदा करती है।
आगे क्या?
निवेशकों को अब Biological Diversity (Amendment) Act, 2023 के लागू होने और लेवी स्ट्रक्चर में होने वाले बदलावों पर नजर रखनी चाहिए। हाल ही में अथॉरिटी ने 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ₹2.02 करोड़ का भुगतान किया है, जिससे साफ है कि यह रेगुलेटरी प्रोसेस अब और तेज हो रहा है। कंपनियों के मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखें कि वे कैसे इन खर्चों को अपने R&D बजट के साथ बैलेंस कर रहे हैं।
