ITAT Bangalore ने एक बेंगलुरु निवासी की अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें **₹41.69 लाख** के अनएक्सप्लेंड कैश डिपॉजिट को चुनौती दी गई थी। ट्रिब्यूनल ने **4 साल** की देरी को नजरअंदाज करने से साफ मना कर दिया है, जिससे टैक्सपेयर पर अब भारी जुर्माना और टैक्स की देनदारी बरकरार रहेगी।
अपील खारिज होने की वजह
बेंगलुरु के इस निवासी ने ₹41.69 लाख की नकदी जमा को लेकर टैक्स विभाग के आदेशों को चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि वे इनकम टैक्स विभाग के नोटिसों से अनजान थे क्योंकि वे ईमेल या ई-फाइलिंग पोर्टल को नियमित रूप से नहीं देखते थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी सालाना आय टैक्सेबल लिमिट से कम है।
ट्रिब्यूनल की सख्ती
ट्रिब्यूनल बेंच के अकाउंटेंट मेंबर वसीम अहमद और जुडिशियल मेंबर केशव दुबे ने इन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि 'जानकारी न होना' या 'पोर्टल चेक न करना' 4 साल की देरी का वाजिब कारण नहीं हो सकता। चूंकि टैक्सपेयर पहले भी रिटर्न फाइल कर चुके थे, इसलिए उनकी अनजान होने की दलील पर ट्रिब्यूनल ने कोई भरोसा नहीं जताया।
टैक्सपेयर्स के लिए बड़ी चेतावनी
इस मामले ने एक बड़ा सबक दिया है: इनकम टैक्स विभाग द्वारा ईमेल या पोर्टल पर भेजे गए नोटिस कानूनी रूप से 'सर्वर' माने जाते हैं। इन्हें नजरअंदाज करने से 'एक्स-पार्टे' (Ex-parte) ऑर्डर जारी हो सकते हैं, जहां विभाग आपकी गैर-मौजूदगी में फैसला ले लेता है। एक बार आदेश फाइनल हो जाने के बाद कानूनी लड़ाई लड़ना बेहद महंगा और मुश्किल हो जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पोर्टल पर अपनी कॉन्टैक्ट डिटेल्स को अपडेट रखना और समय-समय पर ई-फाइलिंग डैशबोर्ड चेक करते रहना हर नागरिक के लिए अनिवार्य है। लापरवाही के कारण एक मामूली टैक्स क्वेरी भी भविष्य में बड़ी फाइनेंशियल लायबिलिटी बन सकती है।
