IBBI ने पर्सनल गारंटी रिपेमेंट प्लान में 'Related Parties' को वोटिंग से बाहर रखने का प्रस्ताव रखा है। यह कदम सुभाष चंद्रा मामले में हुए **99.97%** के भारी नुकसान (Haircut) के बाद उठाया गया है, ताकि उधारदाताओं के हितों की रक्षा की जा सके।
दिवाला नियामक (Insolvency Regulator) एक बड़ी खामी को दूर करने की तैयारी कर रहा है, जिसने अब तक पर्सनल इनसॉल्वेंसी मामलों में रिपेमेंट प्लान को प्रभावित करने की छूट दे रखी थी। Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) ने एक चर्चा पत्र जारी किया है, जिसमें हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकने के लिए सख्त नए नियम प्रस्तावित किए गए हैं।
सुभाष चंद्रा मामला बना ट्रिगर
यह बदलाव Essel Group के फाउंडर सुभाष चंद्रा से जुड़े विवाद का सीधा असर है। उस मामले में, ₹22,006 करोड़ के दावों के मुकाबले केवल ₹6.25 करोड़ की रिकवरी वाले प्लान को National Company Law Tribunal (NCLT) ने मंजूरी दी थी, जो कि कर्जदाताओं के लिए 99.97% का घाटा था। हालांकि NCLT की स्पेशल बेंच ने इस आदेश पर रोक लगा दी है, लेकिन इस घटना ने नियामक को सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर किया है।
प्रस्ताव की मुख्य बातें:
- जीरो वोटिंग शेयर: अब कर्जदार से जुड़ी किसी भी 'Related Party' की वोटिंग पावर को शून्य माना जाएगा, ताकि वे अपने ही रिपेमेंट की शर्तों को तय न कर सकें।
- डेफिनेशन का विस्तार: IBBI 'Related Party' की परिभाषा को और व्यापक बना रहा है ताकि कोई भी कंपनी या इकाई इस दायरे से बच न सके।
- ट्रांसपेरेंसी और वैल्यूएशन: सेटलमेंट के लिए अब स्पष्ट कमर्शियल तर्क देना अनिवार्य होगा। साथ ही, प्लान पर वोटिंग से पहले स्वतंत्र एसेट वैल्यूएशन को अनिवार्य किया जा रहा है।
निवेशकों के लिए क्यों जरूरी है?
प्रोमोटर लोन के लिए पर्सनल गारंटी एक बड़ा सिक्योरिटी लेयर होती है। यदि इनसॉल्वेंसी प्रोसेस में निष्पक्षता नहीं रही, तो इन गारंटियों की वैल्यू खत्म हो जाएगी। इन प्रस्तावित बदलावों से बैंक और निवेशकों को राहत मिलने की उम्मीद है, हालांकि नई परिभाषाओं के चलते कोर्ट में लंबी कानूनी लड़ाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इस ड्राफ्ट पर पब्लिक कमेंट्स देने की डेडलाइन 3 अक्टूबर 2026 है, जबकि सुभाष चंद्रा मामले की अगली सुनवाई 23 सितंबर 2026 को होनी है।
