Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) ने रियल एस्टेट सेक्टर के लिए एक बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है। अब पूरी कंपनी को लिक्विडेट करने के बजाय, हर प्रोजेक्ट को अलग-अलग हल करने पर जोर दिया जाएगा, जिससे **2.5 लाख** से ज्यादा होमबायर्स को राहत मिलने की उम्मीद है।
क्या है नया बदलाव?
IBBI ने जुलाई 2026 में जारी अपने डिस्कशन पेपर में स्पष्ट किया है कि अब डेवलपर की पूरी कंपनी को एक साथ दिवालिया प्रक्रिया में उलझाने के बजाय, प्रोजेक्ट-दर-प्रोजेक्ट समाधान निकाला जाएगा। इसका मकसद घर खरीदारों को उनके अधूरे फ्लैट्स का पजेशन जल्द से जल्द दिलाना है।
क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
अभी तक की प्रक्रिया में जब कोई बड़ा बिल्डर दिवालिया होता है, तो उसके सारे प्रोजेक्ट्स एक ही कानूनी प्रक्रिया में फंस जाते हैं। इससे वे प्रोजेक्ट्स भी रुक जाते हैं जो लगभग पूरे हो चुके थे। इस नए फ्रेमवर्क से पूरे होने वाले या अधूरे प्रोजेक्ट्स को कंपनी के अन्य कर्ज के बोझ से अलग किया जा सकेगा।
पारदर्शिता और लिक्विडिटी पर जोर
IBBI ने दो अहम शर्तें रखी हैं:
- तकनीकी ऑडिट: Resolution Professionals (RPs) को इंडिपेंडेंट एजेंसी से कंस्ट्रक्शन स्टेटस और बाकी लागत का ऑडिट कराना अनिवार्य होगा।
- RERA खातों की सुरक्षा: दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद, RERA-मेंडेट प्रोजेक्ट अकाउंट्स चालू रहेंगे ताकि कंस्ट्रक्शन साइट पर फंड की कमी न हो।
चुनौतियां अभी बाकी हैं
हालांकि यह कदम 553 अटके हुए प्रोजेक्ट्स के लिए उम्मीद की किरण है, लेकिन निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि NCLT के फैसलों और जमीनी हकीकत के बीच का फासला अभी भी एक बड़ा रिस्क है। वित्तीय कर्जदाताओं (Financial Lenders) और घर खरीदारों के हितों का टकराव इस पूरी प्रक्रिया की सफलता की राह में एक बड़ी चुनौती बना रह सकता है।
