Grievance Appellate Committee (GAC) में करीब **50,000** शिकायतें लंबित हैं, जो सरकार के **30** दिन के लक्ष्य से कहीं ज्यादा हैं। अब शिकायतों के निपटारे में **100** दिन तक का वक्त लग रहा है, जिससे डिजिटल कंपनियों पर रेगुलेटरी सख्ती और कंप्लायंस का बोझ बढ़ सकता है।
सितंबर 2026 तक Grievance Appellate Committee (GAC) में करीब 49,978 पेंडिंग मामले दर्ज किए गए हैं। नवंबर 2025 में यह आंकड़ा महज 174 था, जो अब 15 गुना से भी ज्यादा बढ़ चुका है। सरकार का टारगेट शिकायतों को 30 दिन के भीतर निपटाने का था, लेकिन वर्तमान में औसत वेटिंग पीरियड 100 दिन तक पहुंच गया है।
बल्क फाइलिंग से सिस्टम पर दबाव
इस संकट की बड़ी वजह आधार (Aadhaar) क्रेडेंशियल्स का इस्तेमाल करके की जा रही बल्क फाइलिंग है। बिचौलियों द्वारा सिस्टम के इस दुरुपयोग के कारण असली शिकायतों का निपटारा मुश्किल हो गया है। साथ ही, GAC के पास फाइनेंशियल फ्रॉड के अधिकार क्षेत्र न होने से पीड़ितों को नेशनल साइबरक्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल जैसे अलग-अलग प्लेटफार्मों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।
कंपनियों के लिए क्या हैं संकेत?
डिजिटल सेक्टर के निवेशकों के लिए यह प्रशासनिक देरी एक बड़ा अलार्म है। COAI जैसी संस्थाएं अब सरकार से केवल शिकायतों के निपटारे के बजाय फ्रॉड प्रिवेंशन पर जोर देने की मांग कर रही हैं। यदि सरकार मौजूदा नियमों को कड़ा करती है, तो डिजिटल कंपनियों के लिए ऑपरेटिंग और कंप्लायंस कॉस्ट में इजाफा हो सकता है। SFLC.in ने भी प्रक्रिया में पारदर्शिता और तय समय-सीमा की कमी पर सवाल उठाए हैं। आने वाले समय में यूजर वेरिफिकेशन और डेटा हैंडलिंग को लेकर नए सख्त नियम देखने को मिल सकते हैं, जिसका सीधा असर कंपनियों के मार्जिन पर पड़ सकता है।
