सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संकेत दिए हैं कि सरकार DPDP Act में संशोधन कर सकती है ताकि पत्रकारिता को पूरी सुरक्षा मिले। यह कदम मीडिया हाउस के लिए डेटा अनुपालन से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए उठाया गया है।
केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वह 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन' (DPDP) एक्ट में संशोधन करने के लिए तैयार है, ताकि पत्रकारिता से जुड़ी गतिविधियों को स्पष्ट कानूनी सुरक्षा मिल सके। हालिया चर्चाओं में मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संकेत दिया कि यदि इंडस्ट्री को काम करने के लिए कठोर सुरक्षा मानकों की जरूरत है, तो सरकार कानून में बदलाव पर विचार कर सकती है। यह फैसला तब आया है जब 'डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन' ने सुप्रीम कोर्ट में मौजूदा नियमों को चुनौती दी थी, क्योंकि डेटा सहमति और नोटिस से जुड़े सख्त नियम खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) में बाधा डाल रहे थे।
मीडिया ऑपरेशंस और अनुपालन पर असर
निवेशकों और मीडिया कंपनियों के लिए फिलहाल DPDP Act से जुड़ी अस्पष्टता एक बड़ा सिरदर्द बनी हुई थी। न्यूज रूम सार्वजनिक हित की जानकारी जुटाते हैं, लेकिन मौजूदा कानून के तहत डेटा सहमति की कड़ी शर्तें व्यावहारिक नहीं थीं। अगर इन नियमों में छूट नहीं दी जाती, तो मीडिया कंपनियों को जटिल 'कंसेंट मैनेजमेंट सिस्टम' बनाने पड़ते, जिससे लीगल और डेटा प्राइवेसी पर खर्च काफी बढ़ जाता। अब नीतिगत स्पष्टता से इन कंपनियों की ऑपरेशनल एफिशिएंसी बनी रहेगी।
नियामक अनिश्चितता में कमी
हालांकि सरकार का मानना है कि मौजूदा कानून संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप है, लेकिन एडिटर्स के साथ बातचीत करने की इच्छा एक सकारात्मक रुख है। रेगुलेटरी अनिश्चितता अक्सर खबरों की कवरेज में सावधानी और कानूनी खर्च बढ़ने का कारण बनती है। पत्रकारों के लिए अलग से सुरक्षा दायरे तय होने से कंपनियों पर कानूनी कार्रवाई या जुर्माने का खतरा कम होगा, जिसे शेयर बाजार में एक 'रिस्क-मिटिगेशन' फैक्टर के तौर पर देखा जा रहा है।
आगे की राह पर रखें नजर
अगला अहम चरण सूचना और प्रसारण मंत्रालय और एडिटर्स के बीच होने वाली बैठक है। यह देखना जरूरी होगा कि संशोधन कितना व्यापक होता है और संसद में इसे कब पेश किया जाता है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस पर भी बाजार की नजर बनी रहेगी, क्योंकि इसका सीधा असर मीडिया कंपनियों की भविष्य की लागत और कानूनी जोखिमों पर पड़ेगा।
