SEZ Rules: सरकार का बड़ा फैसला, अब वापस मंगवा सकेंगे डोमेस्टिक मार्केट से रिजेक्ट हुए माल

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
SEZ Rules: सरकार का बड़ा फैसला, अब वापस मंगवा सकेंगे डोमेस्टिक मार्केट से रिजेक्ट हुए माल

सरकार ने स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) के नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब मैन्युफैक्चरर्स डोमेस्टिक मार्केट से रिजेक्ट होकर वापस आने वाले माल को फिर से SEZ यूनिट में ला सकेंगे, जिससे अनसोल्ड इन्वेंट्री और नुकसान कम होगा।

भारत सरकार ने स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) के नियमों को और अधिक लचीला बना दिया है। पहले, SEZ यूनिट्स को उन सामानों को मैनेज करने में काफी परेशानी होती थी, जिन्हें फैशन में बदलाव, कॉन्ट्रैक्ट टूटने या मार्केट कंडीशंस के चलते डोमेस्टिक टैरिफ एरिया (DTA) के खरीदारों ने रिजेक्ट कर दिया था। अब नए नियमों के तहत कंपनियां इस माल को वापस अपनी SEZ फैसिलिटी में ला सकेंगी, जिससे इन्वेंट्री का अंबार और बड़े नुकसान से बचा जा सकेगा।

माल वापसी के नियम

इस नई पॉलिसी का सीधा फायदा उन मैन्युफैक्चरर्स को होगा जो हाई-वैल्यू स्टॉक के साथ डील करते हैं। नए दिशानिर्देशों के अनुसार, SEZ यूनिट्स को क्लीयरेंस की तारीख से 30 दिन के भीतर रिजेक्टेड माल वापस लाने की अनुमति दी गई है। हालांकि, यह छूट पूरी तरह से खुली नहीं है। टैक्स चोरी रोकने के लिए सरकार ने सख्त दस्तावेजीकरण (Documentation) अनिवार्य कर दिया है। कंपनियों को साबित करना होगा कि ओरिजिनल डोमेस्टिक बायर ने किसी भी प्रकार का इनपुट टैक्स क्रेडिट नहीं लिया है, साथ ही इन्हें अपनी इन्वेंट्री का अलग से ऑडिट ट्रैक भी रखना होगा।

फाइनेंशियल और ऑपरेशनल असर

निवेशकों के नजरिए से देखें तो यह बदलाव वर्किंग कैपिटल और ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बेहतर बनाने वाला है। टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोटिव कंपोनेंट्स जैसे सेक्टरों में इन्वेंट्री एक बहुत बड़ी कॉस्ट होती है। माल की मरम्मत या उसे फिर से एक्सपोर्ट करने की आजादी मिलने से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन सुरक्षित रहेंगे। रिपेयर के लिए आने वाले सामान पर केवल वैल्यू-एडेड रिपेयर पार्ट्स पर ही ड्यूटी लगेगी, जो कि कंपनियों के लिए एक बड़ी बचत है।

DTA सेल्स का गणित

यह ध्यान रखना जरूरी है कि SEZ यूनिट्स को डोमेस्टिक मार्केट में माल बेचने की अनुमति होती है, लेकिन यह उनके पिछले 3 वर्षों के सबसे अधिक एक्सपोर्ट वैल्यू के 30% तक ही सीमित है। इस पर ड्यूटी दर आमतौर पर 5% से 12.5% के बीच होती है। हालांकि सरकार ने लचीलापन दिया है, लेकिन कंप्लायंस का बोझ बना रहेगा। जिन कंपनियों के इंटरनल कंट्रोल सिस्टम मजबूत हैं, उन्हें ही इस बदलाव का सबसे ज्यादा लाभ मिलने की उम्मीद है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.