GST Council की 57वीं बैठक में ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स पर टैक्स नियमों को लेकर स्थिति स्पष्ट करने पर जोर दिया जा रहा है। Flipkart पर संभावित **₹500 करोड़** की टैक्स देनदारी का मामला सुर्खियों में है, जहां लॉजिस्टिक्स सेवाओं पर मिलने वाली छूट को लेकर विवाद गहराया हुआ है।
दिल्ली में आयोजित 57वीं GST Council की बैठक में इस बार ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स का टैक्स ट्रीटमेंट सबसे अहम चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि परिषद 'GST 2.0' सुधारों पर काम कर रही है, जिसमें छोटे विक्रेताओं के लिए रजिस्ट्रेशन आसान बनाना शामिल है, लेकिन डिजिटल लॉजिस्टिक्स मॉडल पर टैक्स की अस्पष्टता अभी भी एक बड़ा सिरदर्द बनी हुई है।
क्या है पूरा विवाद?
मुद्दा मुख्य रूप से हब-आधारित डिलीवरी सेवाओं के क्लासिफिकेशन का है। मौजूदा नियमों के तहत, Goods Transport Agency (GTA) सेवाओं को कुछ स्थितियों में टैक्स छूट मिलती है। लेकिन समस्या यह है कि क्या ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स की एकीकृत लॉजिस्टिक्स सर्विस—जिसमें सॉर्टिंग, ट्रैकिंग और ट्रांसशिपमेंट शामिल है—क्या इसे GTA माना जा सकता है? राज्य सरकारों के बीच इस पर अलग-अलग राय है, जिससे कंपनियों के लिए अनिश्चितता का माहौल बन गया है।
Flipkart पर कितना असर?
इस मामले के केंद्र में Flipkart है, जिसने पश्चिम बंगाल अथॉरिटी के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें उसे GTA टैक्स छूट देने से इनकार कर दिया गया था। कलकत्ता हाई कोर्ट में 16 नवंबर, 2026 को इस पर सुनवाई होनी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस केस में करीब ₹500 करोड़ की टैक्स लायबिलिटी का दांव लगा है, जो इस सेक्टर की बड़ी कंपनियों के लिए एक गंभीर रिस्क फैक्टर हो सकता है।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
अगर सरकार इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश (National Standard) जारी करती है, तो ई-कॉमर्स कंपनियों का कंप्लायंस बोझ कम होगा और भविष्य की फाइनेंशियल प्लानिंग आसान हो जाएगी। हालांकि, अगर कोई स्पष्टता नहीं आई, तो अलग-अलग राज्यों में कानूनी और ऑपरेशनल अस्थिरता बनी रह सकती है। आने वाले समय में हाई कोर्ट का फैसला इस सेक्टर के लिए एक बड़ा नजीर (Precedent) साबित होगा।
