विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) अब सेकेंडरी मार्केट के बजाय भारतीय IPO और QIP में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं। यह रणनीतिक बदलाव भारत की ग्रोथ में उनका भरोसा तो दिखाता है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच यह एक बड़ा बदलाव है।
प्राइमरी मार्केट बना निवेशकों की पहली पसंद
विदेशी निवेशक अब भारतीय शेयर बाजार में अपनी रणनीति बदल रहे हैं। लिस्टेड शेयरों में बिकवाली के बावजूद, ये निवेशक IPO और QIP जैसे प्राइमरी मार्केट के जरिए भारतीय कंपनियों में जमकर पैसा लगा रहे हैं। यह संकेत है कि ग्लोबल निवेशक भारत से पूरी तरह बाहर नहीं निकल रहे, बल्कि अपनी पसंद के मामले में काफी चुनिंदा हो गए हैं। प्राइमरी मार्केट में निवेश करके ये निवेशक सेकेंडरी मार्केट की उथल-पुथल से बचते हुए सीधे ग्रोथ वाली कंपनियों में हिस्सेदारी बना रहे हैं।
आंकड़ों की जुबानी: भारी आउटफ्लो और बदली तस्वीर
आंकड़े बताते हैं कि साल 2026 में अब तक सेकेंडरी मार्केट से ₹2.32 लाख करोड़ की भारी निकासी हो चुकी है। यह आंकड़ा 2025 के पूरे साल के ₹1.66 लाख करोड़ के कुल निकास से कहीं ज्यादा है। केवल सितंबर 2026 के पहले हफ्ते में ही विदेशी निवेशकों ने ₹7,443 करोड़ के शेयर बेचे, जिससे जुलाई और अगस्त की खरीदारी का सिलसिला थम गया।
बाजार पर ग्लोबल फैक्टर्स का दबाव
इस बिकवाली की मुख्य वजहें वैश्विक आर्थिक दबाव हैं। कच्चा तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें, मजबूत होता डॉलर और बढ़ती अमेरिकी बॉन्ड यील्ड (US Bond Yields) जैसे कारक भारतीय बाजार को ग्लोबल फंड्स के लिए कम आकर्षक बना रहे हैं। इस वजह से वे अपने पोर्टफोलियो को रिबैलेंस कर रहे हैं।
डोमेस्टिक सपोर्ट की भूमिका
अच्छी बात यह है कि बाजार में बड़ी गिरावट नहीं देखी गई है, क्योंकि घरेलू संस्थागत निवेशक (DIIs) मजबूती के साथ खड़े हैं। DIIs लगातार खरीदारी कर रहे हैं, जिससे विदेशी बिकवाली का दबाव कम हो रहा है और बाजार में लिक्विडिटी बनी हुई है।
अब निवेशकों को आने वाले IPOs की डिमांड और ग्लोबल लेवल पर कच्चे तेल की कीमतों व अमेरिकी ब्याज दरों पर खास नजर रखनी होगी, क्योंकि यही तय करेंगे कि बाजार की चाल आगे कैसी रहने वाली है।
