गुरुवार को NSE के क्लोजिंग ऑक्शन में **₹16,613 करोड़** का बंपर वॉल्यूम दर्ज किया गया, जो अब तक का दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। इस उछाल के पीछे FTSE इंडेक्स में बदलाव के चलते ग्लोबल पैसिव फंड्स द्वारा की गई पोर्टफोलियो एडजस्टमेंट है।
बाजार में हलचल की वजह
गुरुवार को नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के आखिरी कुछ मिनटों के ट्रेडिंग सेशन यानी क्लोजिंग ऑक्शन में जबरदस्त हलचल दिखी। ग्लोबल इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स ने FTSE इंडेक्स के बदले हुए वेटेज के अनुसार अपनी होल्डिंग्स को एडजस्ट किया, जिससे कारोबार का आंकड़ा ₹16,613 करोड़ तक पहुंच गया। यह एक्सचेंज के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा क्लोजिंग ऑक्शन वॉल्यूम है।
क्यों बढ़ता है वॉल्यूम?
यह सारा खेल 'पैसिव इन्वेस्टमेंट फंड्स' का है। ये फंड्स FTSE या MSCI जैसे खास इंडेक्स को ट्रैक करते हैं। जब भी ये इंडेक्स प्रोवाइडर्स अपनी लिस्ट में किसी कंपनी को जोड़ते या हटाते हैं, या फिर उनके वेटेज में बदलाव करते हैं, तो इन फंड्स को अनिवार्य रूप से उसी अनुपात में शेयर खरीदने या बेचने पड़ते हैं। भारी मात्रा में फंड मैनेज करने के कारण, दिन के अंत में इनकी खरीद-फरोख्त से मार्केट वॉल्यूम में बड़ा उछाल आता है।
रिकॉर्ड और सीमाएं
भले ही यह आंकड़ा बड़ा लग रहा हो, लेकिन यह 31 अगस्त को हुए MSCI रीबैलेंसिंग के रिकॉर्ड ₹39,718 करोड़ के मुकाबले काफी कम है। निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि NSE का क्लोजिंग ऑक्शन फिलहाल सिर्फ उन सिक्योरिटीज तक सीमित है जो F&O (Futures and Options) सेगमेंट का हिस्सा हैं, इसलिए इसका असर पूरे मार्केट पर नहीं, बल्कि चुनिंदा शेयरों पर ही दिखता है।
आगे क्या होगा?
अब बाजार की नजरें इस महीने के अंत में होने वाली 'Nifty इंडेक्स रीबैलेंसिंग' पर टिकी हैं। जानकारों का मानना है कि वहां भी हमें ऐसा ही भारी वॉल्यूम और वोलेटिलिटी (Volatility) देखने को मिल सकती है। ग्लोबल इंडेक्स प्रोवाइडर्स का भारतीय बाजार की लिक्विडिटी पर प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए ट्रेडर्स को सावधान रहने की जरूरत है।
