Quick Commerce: FSSAI के कड़े नियम, अब सामान की एक्सपायरी डेट दिखाना होगा अनिवार्य

SEBIEXCHANGE
Whalesbook Logo
AuthorAditi Chauhan|Published at:
Quick Commerce: FSSAI के कड़े नियम, अब सामान की एक्सपायरी डेट दिखाना होगा अनिवार्य

FSSAI ने क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के लिए नए नियम लागू कर दिए हैं, जिसके तहत अब प्रोडक्ट्स पर एक्सपायरी डेट और बैच नंबर जैसी अहम जानकारी देना जरूरी होगा। शिकायतों और हाइजीन चिंताओं के बीच, यह रेगुलेटरी बदलाव कंपनियों के ऑपरेशनल खर्च और अनुपालन (Compliance) चुनौतियों को बढ़ा सकता है।

रेगुलेटर का सख्त रुख

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) अब क्विक कॉमर्स सेक्टर को लेकर बेहद सख्त हो गया है। रेगुलेटर का लक्ष्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिकने वाले हर सामान के लिए पारदर्शी जानकारी सुनिश्चित करना है। अब कंपनियों को मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट और बैच नंबर जैसी डीटेल्स ऐप पर साफ-साफ दिखानी होंगी। यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि ऑनलाइन खरीदार भी उतने ही जागरूक रहें, जितने वे रिटेल स्टोर्स पर होते हैं।

कंपनियों पर ऑपरेशनल दबाव

इस बदलाव का सीधा असर कंपनियों के इन्वेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम पर पड़ेगा। अब तक कई प्लेटफॉर्म्स केवल जनरल शेल्फ-लाइफ जानकारी देते थे, लेकिन अब उन्हें अपने डिजिटल स्टोरफ्रंट को 'डार्क स्टोर्स' (Dark Stores) में मौजूद असली इन्वेंट्री के साथ सिंक करना होगा। इसके अलावा, FSSAI ने डार्क स्टोर्स और क्लाउड किचन पर भी फिजिकल इंस्पेक्शन बढ़ा दिए हैं। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पहले ही हाइजीन मानकों के उल्लंघन के कारण लाइसेंस सस्पेंड किए जा चुके हैं।

मार्केट प्लेयर्स पर क्या होगा असर?

इस नियम का असर Blinkit (Zomato), Swiggy Instamart, Zepto, और Tata की BigBasket जैसी बड़ी कंपनियों पर पड़ेगा। इन कंपनियों के लिए डिलीवरी स्पीड बनाए रखने के साथ-साथ इन नए नियमों का पालन करना एक बड़ी चुनौती होगी। इससे कंपनियों का ऑपरेशनल खर्च बढ़ना तय है।

इसके अलावा, इंडस्ट्री अब सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी इंतजार कर रही है, जिसमें 'फ्रंट-ऑफ-पैक' वार्निंग लेबल्स का प्रस्ताव है। अगर इसे मंजूरी मिलती है, तो पैकेट पर चीनी, नमक और फैट को लेकर लाल रंग के हेक्सागोनल मार्क लगाने होंगे, जिससे कुछ कैटेगरी के सामान की बिक्री पर असर पड़ सकता है।

निवेशकों के लिए क्या है जरूरी?

निवेशकों को अब यह देखना होगा कि ये कंपनियां अपनी ग्रोथ और रेगुलेटरी कंप्लायंस के बीच बैलेंस कैसे बनाती हैं। ऑपरेशनल कॉस्ट में बढ़ोतरी और रेगुलेटरी नोटिसेज की फ्रीक्वेंसी पर नजर रखना अब जरूरी हो गया है। जो कंपनियां डिलीवरी स्पीड से समझौता किए बिना इन नियमों को लागू कर पाएंगी, बाजार में वही अपनी बढ़त बरकरार रख सकेंगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.