1.08 लाख घरों के एक हालिया सर्वे में सामने आया है कि उपभोक्ता प्रोसेस्ड फूड पर सख्त वार्निंग लेबल चाहते हैं। 10 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से एफएमसीजी (FMCG) कंपनियों के लिए नियमों में बड़े बदलाव हो सकते हैं, जिसका सीधा असर उनके मुनाफे और पैकिंग लागत पर पड़ सकता है।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) पर अब दबाव बढ़ता जा रहा है। हाल ही में हुए एक सर्वे में 80% भारतीय परिवारों ने मांग की है कि पैकेज्ड फूड पर तुरंत सख्त वार्निंग लेबल लगाए जाएं। यह सर्वे 1,08,000 उपभोक्ताओं पर किया गया है, जो अब उस प्रस्ताव के खिलाफ हैं जिसमें वार्निंग लेबल केवल तभी लगाने की बात कही गई है जब उत्पाद में दो या अधिक हानिकारक पोषक तत्व हों। उपभोक्ताओं की मांग है कि किसी भी एक पोषक तत्व (जैसे चीनी, नमक या सैचुरेटेड फैट) की अधिकता पर ही चेतावनी अनिवार्य होनी चाहिए।
कंपनियों के लिए क्या है चुनौती?
खाद्य निर्माता लंबे समय से 'फ्रंट-ऑफ-पैक' लेबलिंग का विरोध कर रहे हैं। कंपनियां अक्सर यह तर्क देती रही हैं कि पोषक तत्वों का मानक 100 ग्राम के बजाय 'प्रति सर्विंग' (per serving) होना चाहिए, ताकि लेबल पर कम मात्रा दिखाई दे और वे वार्निंग से बच सकें। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इससे ग्राहकों के लिए उत्पादों की तुलना करना मुश्किल हो जाता है।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Investment Risk)
FMCG सेक्टर में निवेश करने वालों के लिए यह मामला काफी महत्वपूर्ण है। नए नियमों को 1 जुलाई 2027 तक लागू होना है। यदि कोर्ट सख्त आदेश देता है, तो कंपनियों को अपनी पैकेजिंग पूरी तरह से बदलनी होगी और प्रोडक्शन लाइन्स को अपडेट करना होगा, जिससे लागत में भारी बढ़ोतरी तय है। इसके अलावा, यदि उत्पादों पर स्पष्ट चेतावनी के निशान लगते हैं, तो अधिक चीनी, नमक या फैट वाले उत्पादों की बिक्री में गिरावट आ सकती है।
डिजिटल पारदर्शिता का मुद्दा
सर्वे में 91% लोगों ने यह भी कहा है कि ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर भी ये वार्निंग लेबल दिखने चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो कंपनियों को अपने डिजिटल कैटलॉग भी बदलने होंगे। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह साफ हो जाएगा कि क्या इंडस्ट्री को तैयारी के लिए और समय मिलेगा या उन्हें आनन-फानन में अपनी मार्केटिंग और पैकेजिंग रणनीति बदलनी होगी।
