सितंबर 2026 में विदेशी निवेशकों (FPIs) ने भारतीय शेयर बाजार से **₹45,537 करोड़** की बड़ी निकासी की है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि उन्होंने IPOs में **₹9,676 करोड़** का निवेश भी किया है। यह कदम बाजार से बाहर निकलने का संकेत नहीं, बल्कि बेहतर वैल्यूएशन की तलाश है।
सितंबर 2026 के आंकड़ों पर नजर डालें तो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की रणनीति में एक बड़ा बदलाव दिख रहा है। 'पेड टू वेट' रिव्यू के मुताबिक, FPIs ने सेकेंडरी मार्केट में ₹45,537 करोड़ के इक्विटी शेयर बेच दिए। इसके उलट, उन्होंने प्राइमरी मार्केट यानी नए IPOs और फ्रेश प्लेसमेंट में ₹9,676 करोड़ झोंक दिए। यह स्पष्ट करता है कि वे भारत से अपना बोरिया-बिस्तर नहीं समेट रहे हैं, बल्कि अपनी पूंजी को नए और सस्ते एंट्री पॉइंट्स की ओर शिफ्ट कर रहे हैं।
क्यों IPOs की ओर भाग रहे FPIs?
संस्थानिक निवेशक उन मैच्योर कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी कम कर रहे हैं जिनकी वैल्यूएशन उन्हें महंगी लग रही है। IPOs के जरिए वे उन कीमतों पर शेयर हासिल कर लेते हैं जो ओपन मार्केट से खरीदारी करने पर नहीं मिलतीं।
फंडरेजिंग का नया रिकॉर्ड
मौजूदा फाइनेंशियल ईयर की पहली छमाही में भारतीय कंपनियों ने ₹2.43 लाख करोड़ जुटाए हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 75% अधिक है। हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह है कि इस राशि का 53% हिस्सा 'ऑफर फॉर सेल' (OFS) से आया है। इसका मतलब है कि पुरानी कंपनियां या प्रमोटर्स अपना हिस्सा बेच रहे हैं, न कि बिजनेस विस्तार के लिए फंड जुटा रहे हैं।
रिटेल निवेशकों के लिए सीख
बाजार के जानकारों का मानना है कि FPIs की भारी बिकवाली के बावजूद भारतीय घरेलू लिक्विडिटी ने बाजार को संभाल रखा है। रिटेल निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे FPIs की चाल को कॉपी करने के बजाय अपनी SIP (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) पर फोकस बनाए रखें। संस्थागत निवेशक लंबी अवधि की रणनीति के साथ IPOs में एंट्री करते हैं, जबकि आम निवेशकों को शॉर्ट-टर्म गेन्स के चक्कर में हाई-रिस्क नहीं लेना चाहिए। लंबी अवधि के वेल्थ क्रिएशन के लिए कंपनी के फंडामेंटल्स को समझना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।
