साल 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय सेकेंडरी मार्केट से रिकॉर्ड **₹3 लाख करोड़** की निकासी की है, जबकि नए IPOs में **₹54,000 करोड़** से ज्यादा का निवेश किया है। यह बदलाव महंगी वैल्यूएशन के चलते निवेशकों की सतर्कता को दर्शाता है।
वैल्यूएशन का गेम
विदेशी निवेशकों की इस बदली हुई रणनीति के पीछे मुख्य वजह स्टॉक्स की कीमत है। FPIs को NSE और BSE पर लिस्टेड मौजूदा कंपनियां काफी महंगी लग रही हैं, जहां उन्हें ग्रोथ की कम संभावनाएं दिख रही हैं। इसके विपरीत, IPOs उन्हें 'वैल्यूएशन कुशन' देते हैं, जिससे वे नई कंपनियों में कम कीमत पर हिस्सेदारी बना पा रहे हैं। वे खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स, कंज्यूमर टेक्नोलॉजी और रिन्यूएबल्स जैसे सेक्टर में दांव लगा रहे हैं।
सितंबर 2026 में यह ट्रेंड साफ दिखा, जब 34 कंपनियों ने कुल ₹39,380 करोड़ जुटाए। इसमें नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का बड़ा IPO शामिल था, जो कुल गतिविधि का 57% रहा।
लार्ज-कैप स्टॉक्स पर दबाव
FPIs की बिकवाली का सीधा असर HDFC Bank, Infosys और Reliance Industries जैसे दिग्गज शेयरों पर पड़ा है। चूँकि विदेशी निवेशक भारतीय बाजार में लिक्विडिटी का सबसे बड़ा जरिया हैं, इसलिए उनकी बिकवाली से बेंचमार्क इंडेक्स लगातार दबाव में हैं।
आगे क्या है जोखिम?
बाजार में फिलहाल लिक्विडिटी को लेकर चिंता बढ़ रही है। अगर पाइपलाइन में मौजूद लगभग ₹3.86 लाख करोड़ के नए IPOs आते रहे, तो यह पैसा सेकेंडरी मार्केट से पूरी तरह खिंच जाएगा। इसके अलावा, अमेरिका में बॉन्ड यील्ड का बढ़ना, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वेस्ट एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ग्लोबल निवेशकों को भारतीय बाजार से दूर रहने या सतर्क रहने पर मजबूर कर रहे हैं।
