सितंबर 2026 तिमाही में FPI की भारतीय शेयरों में हिस्सेदारी घटकर **14.02%** रह गई है, जो साल 2011 के बाद का सबसे निचला स्तर है। रिकॉर्ड **₹3.08 लाख करोड़** की निकासी के बावजूद घरेलू निवेशक बाजार को मजबूती दे रहे हैं।
विदेशी निवेशकों का भारी 'एग्जिट'
साल 2026 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने भारतीय बाजार से अपने पैर पीछे खींच लिए हैं। अक्टूबर 2026 के मध्य तक FPI ने भारतीय बाजार से रिकॉर्ड ₹3.08 लाख करोड़ निकाले हैं, जो पिछले कई वर्षों के आंकड़ों को पीछे छोड़ देता है। जुलाई और अगस्त में थोड़ी खरीदारी जरूर दिखी थी, लेकिन सितंबर और अक्टूबर में बिकवाली का दौर काफी गहरा गया, जिसका सबसे ज्यादा असर लार्ज-कैप कंपनियों के शेयरों पर देखने को मिला है।
घरेलू निवेशकों की ताकत
जहाँ विदेशी पैसा बाहर जा रहा है, वहीं घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) और रिटेल निवेशक मार्केट के लिए 'शॉक एब्जॉर्बर' बनकर उभरे हैं। SIP (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) और म्यूचुअल फंड्स में रिकॉर्ड इनफ्लो ने बाजार को बड़े क्रैश से बचाया है। यह बदलाव संकेत दे रहा है कि अब भारतीय बाजार विदेशी लिक्विडिटी पर पहले की तुलना में कम निर्भर है और घरेलू पूंजी ही अब मार्केट की दिशा तय कर रही है।
बिकवाली की असली वजहें
इस 'विदेशी पलायन' के पीछे कई ग्लोबल और घरेलू कारण हैं:
- हाई वैल्युएशन: भारतीय शेयर अन्य उभरते बाजारों की तुलना में काफी महंगे दिख रहे हैं, जिसके कारण विदेशी फंड्स मुनाफावसूली कर रहे हैं।
- ग्लोबल प्रेशर: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और डॉलर की मजबूती के कारण विदेशी निवेशक रिस्क कम कर रहे हैं और सुरक्षित एसेट्स की तरफ बढ़ रहे हैं।
- भू-राजनीतिक अनिश्चितता: वैश्विक तनाव ने निवेशकों को कैश हाथ में रखने के लिए मजबूर किया है।
आने वाले दिनों में बाजार की चाल पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि SIP का फ्लो कितना बना रहता है और भारतीय कंपनियां अपने नतीजों में कितनी ग्रोथ दिखाती हैं। जब तक कच्चे तेल की कीमतें और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड स्थिर नहीं होते, बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है।
