अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच विदेशी निवेशकों (FPIs) के एसेट्स अंडर कस्टडी **12%** बढ़कर **₹8.5 लाख करोड़** पर पहुंच गए हैं। हालांकि हाल के महीनों में खरीदारी बढ़ी है, लेकिन कैलेंडर ईयर 2026 के लिए FPIs अभी भी नेट सेलर बने हुए हैं।
वित्तीय वर्ष 2027 के शुरुआती चार महीनों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने बाजार में एक मजबूत वापसी की है। अप्रैल और जुलाई 2026 के बीच इनका कुल एसेट्स अंडर कस्टडी 12% की रिकवरी के साथ ₹8.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया है।
स्टेबिलिटी ला रही है 'स्टिकी' कैपिटल
इस रिकवरी के पीछे मुख्य रूप से कैटेगरी-I के इंस्टीट्यूशनल निवेशक हैं, जिनमें सॉवरेन वेल्थ फंड, पेंशन फंड और सेंट्रल बैंक शामिल हैं। इन्होंने इस दौरान कुल ग्रोथ में करीब 93% का योगदान दिया है। यह 'स्टिकी' कैपिटल बाजार को लंबे समय तक स्थिरता प्रदान करती है क्योंकि ये फंड जल्दी पैसा बाहर नहीं निकालते।
बाजार की तेजी और डेट मार्केट का सहारा
एसेट वैल्यू बढ़ने की वजह केवल नया निवेश नहीं है, बल्कि मौजूदा होल्डिंग्स का वैल्यूएशन भी है। मार्च से जुलाई 2026 के दौरान निफ्टी 50 इंडेक्स में 9.2% का उछाल आया, जिससे विदेशी निवेशकों की पोर्टफोलियो वैल्यू भी बढ़ गई। इसके अलावा, डेट मार्केट में ₹64,000 करोड़ से ज्यादा का निवेश करके FPIs ने इक्विटी मार्केट की अस्थिरता को काफी हद तक बैलेंस किया है।
क्या अभी भी सतर्क रहना चाहिए?
भले ही जुलाई-अगस्त में FPIs ने खरीदारी की हो, लेकिन कैलेंडर ईयर 2026 में अब तक वे नेट सेलर ही हैं। अब तक करीब ₹2.23 लाख करोड़ की इक्विटी निकासी हो चुकी है। खास बात यह है कि जून 2026 तक भारतीय बाजार में डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स का एसेट्स, विदेशी निवेशकों से पहली बार आगे निकल गया है, जो मार्केट को विदेशी उतार-चढ़ाव से बचाने में मदद कर रहा है।
निवेशकों को अब ग्लोबल रिस्क, क्रूड ऑयल की कीमतों और भारतीय रुपए की चाल पर नजर बनाए रखनी चाहिए, क्योंकि इन्हीं फैक्टर्स के आधार पर आगे ग्लोबल फंड्स भारत में पैसा लगाने का फैसला लेंगे।
