सोमवार के कारोबारी सत्र में विदेशी निवेशकों (FIIs) ने भारतीय शेयर बाजार से **₹5,353 करोड़** की भारी बिकवाली की है, जिससे Nifty और Sensex में **1.5%** की गिरावट देखने को मिली। हालांकि, घरेलू निवेशकों (DIIs) ने **₹5,189 करोड़** की खरीदारी कर बाजार को सहारा देने की कोशिश की है, लेकिन क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों और बॉन्ड यील्ड के उछाल ने RBI की ब्याज दरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
सोमवार को बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने इक्विटी सेगमेंट से ₹5,353.22 करोड़ बाहर निकाले। इस बड़ी निकासी का सीधा असर इंडेक्स पर पड़ा, जहाँ Nifty 50 1.56% गिरकर 22,780.25 पर और BSE Sensex 1.52% टूटकर 72,771.72 पर बंद हुआ। यह मार्च के बाद से दोनों बेंचमार्क इंडेक्स का सबसे निचला स्तर है, जो निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
सितंबर में इंस्टीट्यूशनल टग-ऑफ-वार
विदेशी बिकवाली के बीच, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने एक ढाल की तरह काम किया और ₹5,189.02 करोड़ की नेट खरीदारी की। बावजूद इसके, अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का रुख नरम नहीं पड़ा है। सितंबर के कुल 19 ट्रेडिंग सत्रों में से 14 बार FIIs नेट सेलर रहे हैं, जिससे महीने का कुल आउटफ्लो ₹23,885 करोड़ के करीब पहुंच गया है।
ग्लोबल फैक्टर जो बना रहे हैं दबाव
बाजार में इस गिरावट के पीछे ग्लोबल मैक्रो कंडीशंस का खराब होना मुख्य वजह है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के पास बढ़ते तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent crude oil) 3.8% उछलकर $108 प्रति बैरल पर पहुंच गया है। इसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जो आगे चलकर महंगाई बढ़ा सकता है।
इसके साथ ही, उधारी की लागत (Borrowing costs) भी बढ़ रही है। अमेरिका की 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.21% और भारत की 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7.12% पर आ गई है। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो फिक्स्ड-इनकम निवेश शेयरों की तुलना में अधिक आकर्षक हो जाता है, जिससे निवेशक इक्विटी जैसे जोखिम भरे बाजारों से पैसा निकालने लगते हैं।
निवेशकों को क्या ट्रैक करना चाहिए?
महंगी ऊर्जा और बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने ब्याज दरों के आउटलुक को उलझा दिया है। एक्सपर्ट्स को डर है कि इन स्थितियों के कारण रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के लिए दरों में कटौती करना मुश्किल होगा। कुछ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि अक्टूबर में होने वाली सेंट्रल बैंक की पॉलिसी मीटिंग में दरों में बढ़ोतरी (Rate hike) का जोखिम भी बना हुआ है। फिलहाल निवेशकों की नजरें क्रूड ऑयल की कीमतों के स्थिर होने और आने वाले कॉरपोरेट अर्निंग्स पर टिकी होंगी।
