भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों (FIIs) ने अपनी होल्डिंग घटाकर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा दी है। मार्केट लगातार आठवें हफ्ते गिरावट का सामना कर रहा है, जो पिछले **25 सालों** में पहली बार हुआ है। इसकी मुख्य वजह अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं, हालांकि घरेलू संस्थान (DIIs) बाजार को सहारा दे रहे हैं।
बाजार में जारी है दबाव
भारतीय शेयर बाजार इस समय जबरदस्त सेलिंग प्रेशर में है। अक्टूबर 2026 की शुरुआत में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) पर इंडेक्स फ्यूचर्स का लॉन्ग-शॉर्ट रेशियो गिरकर महज 8% पर आ गया है। यह डेटा साफ दिखाता है कि विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी को लेकर कितने नकारात्मक हो गए हैं और लगातार अपने दांव कम कर रहे हैं।
क्यों इतिहास रच रहा है यह फॉल?
Nifty 50 और Sensex ने लगातार 8 हफ्तों की गिरावट दर्ज की है, जो पिछले 25 सालों में सबसे लंबी गिरावट का सिलसिला है। बाजार में कई तकनीकी इंडिकेटर्स इसे 'ओवरसोल्ड' जोन बता रहे थे, यानी उम्मीद थी कि यहां से रिकवरी आएगी, लेकिन निराशाजनक सेंटिमेंट के चलते बाजार संभल नहीं पा रहा है।
गिरावट की असली वजह (Global Triggers)
बाजार से पूंजी निकासी के पीछे कई कारण हैं:
- US Treasury Yields: 10-साल की अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 5% के पार बनी हुई है, जिससे निवेशक उभरते बाजारों (Emerging Markets) से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी एसेट्स की तरफ भाग रहे हैं।
- Brent Crude: कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने ग्लोबल निवेशकों को बेहद सतर्क कर दिया है।
साल 2026 में अब तक FIIs भारतीय बाजारों से ₹2.5 लाख करोड़ से ज्यादा निकाल चुके हैं।
DIIs बने 'संकटमोचक'
इस उतार-चढ़ाव भरे बाजार में एक बड़ी राहत की बात घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) का रुख है। जहां विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं, वहीं DIIs खरीदारी कर रहे हैं। सिर्फ 1 अक्टूबर 2026 को घरेलू फंड्स ने ₹10,000 करोड़ से ज्यादा की खरीदारी की, जिसने बाजार को पूरी तरह क्रैश होने से बचा लिया।
फिलहाल, निवेशकों की नजरें US बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की कीमतों पर टिकी हैं। जब तक इन मोर्चों पर कोई राहत नहीं मिलती, बाजार का यह 'बेयरिश' रुख जारी रहने की आशंका है।
