चुनाव आयोग (ECI) की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के तहत एक साल में 5 करोड़ से ज़्यादा वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं। इस बड़े कदम ने वोटर लिस्ट में गड़बड़ी और सरकारी सुविधाओं से वंचित होने की चिंताओं को बढ़ा दिया है। सुप्रीम कोर्ट के दखल और बढ़ते लीगल मामलों के बीच, व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या हुआ?
चुनाव आयोग (ECI) ने हाल ही में अपनी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का एक साल पूरा किया है। इस बड़े अभियान में, जो तेरह राज्यों और कई यूनियन टेरिटरी में चला, 5 करोड़ से ज़्यादा वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं। आयोग का कहना है कि इसका मुख्य मकसद वोटर लिस्ट से अवैध प्रवासियों को बाहर निकालना था। लेकिन, जिस बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं, उसने प्रशासन की कार्यक्षमता और नागरिकों के अधिकारों पर असर को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
नागरिकों पर असर
वोटर लिस्ट से नाम हटने का असर सिर्फ वोट देने के अधिकार तक ही सीमित नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक, जिन लोगों के नाम लिस्ट से हटा दिए गए हैं, उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं (welfare benefits) का लाभ उठाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ जगहों पर, लोगों को राशन और पासपोर्ट रिन्यूअल जैसी नागरिक सेवाओं (civic services) को पाने में भी दिक्कतें आ रही हैं। यह दिखाता है कि प्रशासनिक रिकॉर्ड का सटीक होना आम आदमी के लिए कितना ज़रूरी है, खासकर जब यह सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा हो।
कानूनी और रेगुलेटरी पहलू
इस SIR प्रक्रिया की वैधता पर कानूनी सवाल भी उठे, जिसके बाद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने साफ किया कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन सिर्फ वोटर लिस्ट को अपडेट करने की एक प्रक्रिया है। इस रिवीजन से किसी की नागरिकता (citizenship) या उससे जुड़े अधिकार तय नहीं होते। यह फैसला एक ज़रूरी सुरक्षा कवच की तरह है, जो चुनावी प्रबंधन को नागरिकता तय करने की कानूनी प्रक्रिया से अलग करता है।
प्रक्रिया और तरीके पर सवाल
SIR के अमल में लाए जाने के तरीके पर भी सवाल उठाए गए हैं। कई जानकारों ने अलग-अलग राज्यों में अपनाए गए तरीकों में एकरूपता की कमी पर ध्यान दिलाया है। उदाहरण के लिए, पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया अपनाई गई, जबकि असम में 'समरी रिवीजन' (summary revision) का तरीका इस्तेमाल हुआ। इस एकरूपता की कमी ने प्रक्रिया की पारदर्शिता (transparency) और निष्ठा (integrity) पर शंका पैदा की है। इसके अलावा, कुछ राजनीतिक दलों ने आरोप लगाया है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल चुनावी मैदान को असमान बनाने के लिए किया जा रहा है, हालांकि ECI अपनी स्वायत्तता (operational autonomy) बनाए रखने का दावा करता है।
आगे क्या देखें?
आने वाले महीनों में सबसे अहम होगा लंबित अपीलों का निपटारा। सिर्फ पश्चिम बंगाल में, न्यायिक ट्रिब्यूनल (judicial tribunals) अभी भी 27 लाख से ज़्यादा उन वोटरों की अपीलों पर सुनवाई कर रहे हैं जो अपना नाम वापस लिस्ट में जुड़वाना चाहते हैं। इन मामलों को संभालने में इन ट्रिब्यूनलों की रफ़्तार और निष्पक्षता, शिकायत निवारण (grievance redressal) व्यवस्था की कार्यक्षमता का एक बड़ा पैमाना होगी। इसके साथ ही, ECI द्वारा अन्य राज्यों में अपनाई जा रही प्रक्रियाओं और वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों को मिलने वाली सुविधाओं के प्रबंधन पर नज़र रखना इस पूरे अभियान के अंतिम नतीजे का आकलन करने के लिए ज़रूरी होगा।
