अगस्त 2026 में भारतीय इक्विटी डेरिवेटिव्स मार्केट में बड़ी सुस्ती देखी गई। सख्त नियमों और क्लोजिंग ऑक्शन सेशन के चलते डेली कॉन्ट्रैक्ट्स में **23%** की गिरावट आई, जो पिछले **13 महीनों** का निचला स्तर है। हालांकि, रिटेल निवेशकों का भरोसा बरकरार है और मार्केट टर्नओवर में उनकी हिस्सेदारी बढ़कर **32.9%** हो गई है।
रेगुलेटरी बदलावों का असर
बाजार में यह गिरावट लगातार 3 महीने से जारी सुस्ती का नतीजा है। 3 अगस्त 2026 को लागू हुए नए 'क्लोजिंग ऑक्शन सेशन' (CAS) ने ट्रेडिंग के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। प्राइस डिस्कवरी को बेहतर बनाने के लिए लाए गए इस नियम के कारण ट्रेडर्स ने क्लोजिंग के समय होने वाली संभावित अस्थिरता से बचने के लिए अपनी एक्टिविटी कम कर दी है। इसके अलावा, बढ़े हुए सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) और कड़े कोलेटरल नियमों ने ट्रेडिंग की लागत को काफी बढ़ा दिया है। आंकड़ों के अनुसार, इक्विटी फ्यूचर्स का टर्नओवर 33 महीने के निचले स्तर पर आ गया है, जबकि ऑप्शंस प्रीमियम टर्नओवर में 15.7% की गिरावट दर्ज की गई है।
रिटेल निवेशकों की मजबूती
कुल कॉन्ट्रैक्ट्स में आई गिरावट के बावजूद, रिटेल निवेशकों की भागीदारी अभी भी मजबूत बनी हुई है। पिछले साल के 29.9% के मुकाबले, इस साल अगस्त में इनका शेयर बढ़कर 32.9% हो गया है। हालांकि, बाजार की बनावट बदल रही है; अब समर्पित ट्रेडर्स बाजार में डटे हैं, जबकि कैश और डेरिवेटिव्स दोनों सेगमेंट में काम करने वाले कैजुअल इन्वेस्टर्स ने थोड़ा कदम पीछे खींचा है। डेटा के मुताबिक, इंडेक्स फ्यूचर्स में मोबाइल ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म्स का दबदबा बढ़ा है।
ब्रोकरेज और एक्सचेंज पर दबाव
ब्रोकर्स और एक्सचेंजों के लिए यह एक चिंता का विषय है क्योंकि डेरिवेटिव्स वॉल्यूम उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा है। फिलहाल, रेगुलेटरी अथॉरिटीज क्लोजिंग ऑक्शन प्रोसेस पर मिले फीडबैक की समीक्षा कर रही हैं। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या यह सुस्ती केवल नियमों में बदलाव का शुरुआती असर है, या फिर यह लंबे समय तक रहने वाली एक नई वास्तविकता है।
