Directorate General of Foreign Trade (DGFT) ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के लिए एक नई इन्वेंट्री-बेस्ड पॉलिसी पेश की है। इसके तहत अब प्लेटफॉर्म्स एक्सपोर्ट के लिए भारतीय सामान स्टॉक कर सकेंगे। इस पॉलिसी में 'Exporter-on-Record' (EOR) मॉडल को मंजूरी दी गई है, जिससे लोकल सेलर्स को **7 दिन** के भीतर पेमेंट और स्ट्रिक्ट इन्वेंट्री सेग्रीगेशन का पालन करना होगा।
अब ग्लोबल मार्केट में आसान होगी पहुंच
सरकार ने नोटिफिकेशन नंबर 27/2026-27 के जरिए एक्सपोर्ट के नियमों को पूरी तरह बदल दिया है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के छोटे और मध्यम उद्यमियों (MSMEs) को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ना है। अब ई-कॉमर्स कंपनियां एक्सपोर्ट के लिए सीधे भारतीय सामान अपने पास स्टोर कर सकेंगी, जिससे लॉजिस्टिक्स और कंप्लायंस का भारी बोझ कम होगा।
EOR और SOR का नया मॉडल
इस नई पॉलिसी में दो अहम भूमिकाएं तय की गई हैं:
- Exporter-on-Record (EOR): यह जिम्मेदारी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स की होगी, जो कस्टम्स और इंटरनेशनल शिपिंग संभालेंगे।
- Seller-on-Record (SOR): ये मूल मैन्युफैक्चरर्स होंगे, जो सिर्फ प्रोडक्शन पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
यह साफ कर दिया गया है कि एक्सपोर्ट के लिए वही माल स्टॉक किया जाएगा जिसका कन्फर्म ओवरसीज ऑर्डर होगा। इससे सट्टेबाजी (speculative stockpiling) पर रोक लगेगी।
सेलर्स की सुरक्षा और नियम
छोटे मैन्युफैक्चरर्स के हितों की रक्षा के लिए सरकार ने कड़े प्रावधान किए हैं:
- पेमेंट क्लॉज: EOR को सामान लेने के 7 दिनों के भीतर सेलर को पेमेंट करना अनिवार्य होगा।
- नो डोमेस्टिक सेल: एक्सपोर्ट के लिए रखा गया माल स्थानीय बाजार में नहीं बेचा जा सकेगा। इससे घरेलू मार्केट में कीमतों में उतार-चढ़ाव नहीं होगा।
निवेशकों के लिए क्या हैं रिस्क?
निवेशकों और बाजार के जानकारों को अब कंपनियों के ऑपरेशनल रिस्क पर नजर रखनी होगी। 'नो डोमेस्टिक सेल' नियम के कारण अगर सामान नहीं बिकता है, तो कंपनी को इन्वेंट्री लॉस या होल्डिंग कॉस्ट का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, डिजिटल ट्रेसेबिलिटी और सरकारी कंप्लायंस का खर्चा भी कंपनियों के मुनाफे पर असर डाल सकता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ई-कॉमर्स दिग्गज इस नए एक्सपोर्ट मॉडल को कितनी कुशलता से संभालते हैं।
