DGFT ने फर्जीवाड़े के आरोप में 15 प्री-शिपमेंट इंस्पेक्शन एजेंसियों (PSIA) का लाइसेंस रद्द कर दिया है। इस फैसले के चलते मेटल स्क्रैप इम्पोर्टर्स को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और बंदरगाहों पर माल फंसने से लागत बढ़ गई है।
नियम उल्लंघन पर DGFT सख्त
डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (DGFT) ने एक बड़े जांच अभियान के बाद 15 प्री-शिपमेंट इंस्पेक्शन एजेंसियों को डी-रिकॉग्नाइज कर दिया है। ये एजेंसियां यह सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार थीं कि भारत में आने वाला मेटल स्क्रैप रेडियोधर्मी या विस्फोटक पदार्थों से मुक्त हो। जांच में पाया गया कि ये फर्में बिना फिजिकल इंस्पेक्शन किए ही सर्टिफिकेट जारी कर रही थीं, जो देश की सुरक्षा के लिए एक बड़ा जोखिम था।
बंदरगाहों पर माल फंसा, इम्पोर्टर्स परेशान
इस रेगुलेटरी एक्शन का सबसे बुरा असर उन इम्पोर्टर्स पर पड़ा है जो मुंद्रा जैसे बड़े पोर्ट्स के जरिए मेटल स्क्रैप मंगवा रहे हैं। इन एजेंसियों द्वारा जारी किए गए सर्टिफिकेट अब अमान्य हो गए हैं, जिसके कारण कस्टम अधिकारी शिपमेंट्स को रोक रहे हैं। इससे कंपनियों को माल फंसे होने के कारण भारी जुर्माना और री-इंस्पेक्शन का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है।
स्टील इंडस्ट्री की चुनौतियां
मेटल स्क्रैप सेकेंडरी स्टील इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल है। सप्लाई चेन में बाधा आने से न केवल उत्पादन प्रभावित हो रहा है, बल्कि ऑपरेशनल खर्च भी बढ़ गए हैं। इम्पोर्टर्स का कहना है कि नियमों के अनुसार डॉक्यूमेंट अपलोड करने के लिए मात्र 2 दिन का समय मिलना मुश्किल होता है, खासकर तब जब माल ट्रांजिट में हो।
समाधान की मांग
Material Recycling Association of India (MRAI) ने इस संकट को देखते हुए पुराने नियमों को बदलने की वकालत की है। MRAI का तर्क है कि भारत के 18 प्रमुख बंदरगाहों पर पहले से ही अत्याधुनिक रेडिएशन स्कैनिंग तकनीक मौजूद है। इसलिए, विदेश में थर्ड-पार्टी इंस्पेक्शन के बजाय अब देश के अंदर ही वेरिफिकेशन प्रोसेस को शिफ्ट कर देना चाहिए।
हालांकि DGFT अभी भी सोर्स-साइड इंस्पेक्शन को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी मानता है, लेकिन उसने डिपार्टमेंट ऑफ रेवेन्यू के साथ मिलकर 'सेफ कंट्री' लिस्ट के विस्तार पर चर्चा करने के संकेत दिए हैं। भविष्य में सरकार द्वारा लिए जाने वाले फैसले और पोर्ट-साइड स्कैनिंग प्रोटोकॉल ही यह तय करेंगे कि मेटल इम्पोर्ट की राह कितनी आसान होगी।
