भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने HP India पर सरकारी टेंडरों में धांधली करने के आरोप में **₹126.87 करोड़** का भारी जुर्माना लगाया है। कंपनी पर आरोप है कि उसने 2017 से 2020 के बीच 16 अधिकृत रिसेलर्स के साथ मिलकर सरकारी खरीद (Government e-Marketplace) में हेरफेर किया, जिससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचा।
सरकारी खरीद में हेरफेर का पूरा खेल
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने HP India को सरकारी टेंडरों में मिलीभगत कर बोली प्रक्रिया में हेरफेर करने का दोषी पाया है। यह जांच 2017 से 2020 तक सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के जरिए हुई खरीद पर केंद्रित थी। आयोग ने पाया कि कंपनी और उसके 16 अधिकृत रिसेलर्स ने मिलकर प्रतिस्पर्धा को कृत्रिम रूप से सीमित किया।
मैन्युफैक्चरर ऑथराइजेशन फॉर्म (MAF) का दुरुपयोग
जांच में पता चला कि इस धांधली का मुख्य हथियार मैन्युफैक्चरर ऑथराइजेशन फॉर्म (MAF) था। सरकारी टेंडरों में यह फॉर्म अक्सर जरूरी होता है। HP India ने इन फॉर्म्स को चुनिंदा रिसेलर्स को जारी करके यह सुनिश्चित किया कि केवल वही बोली लगा सकें जो कंपनी चाहती थी। इस तरह, स्वतंत्र प्रतिस्पर्धियों को प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया।
GeM पोर्टल की शुरुआत के बाद यह गोरखधंधा और तेज हुआ, जिसका मकसद सरकारी खरीद में पारदर्शिता लाना और लागत कम करना था। जांच में सामने आया कि अपने प्रॉफिट मार्जिन और बाजार हिस्सेदारी को बचाने के लिए, रिसेलर्स ने कंपनी के साथ मिलकर इस प्लेटफॉर्म की प्रतिस्पर्धी प्रकृति को खत्म कर दिया। टेंडर नियमों का पालन करने का दिखावा करने के लिए, उन्होंने 'कवर बिडिंग' (Cover Bidding) का सहारा लिया। इसमें, कुछ रिसेलर्स जानबूझकर बहुत ऊंची या गैर-प्रतिस्पर्धी बोलियां लगाते थे, जिससे यह लगे कि कई लोगों ने भाग लिया है, लेकिन असल में सौदा पहले से तय रिसेलर के साथ ही होता था।
CCI का फैसला और HP India का बचाव
HP India ने CCI के सामने अपना बचाव पेश करते हुए कहा था कि वह इस योजना की मुख्य सूत्रधार नहीं है और रिसेलर्स द्वारा जालसाजी (counterfeit goods) की धमकी के दबाव में थी। कंपनी का यह भी कहना था कि रिसेलर्स के बीच तालमेल केवल आंतरिक बिक्री लक्ष्यों को पूरा करने के लिए था।
हालांकि, CCI ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि कंपनी मिलीभगत को सुविधाजनक बनाने में अहम भूमिका निभा रही थी। यह भी उल्लेखनीय है कि यह जांच HP India द्वारा खुद दायर की गई एक 'लैनिएंसी एप्लीकेशन' (Leniency Application) के बाद तेज हुई। इसमें कंपनी ने अपनी गलतियों को स्वीकार किया और जांच में सहयोग किया, जिससे अक्सर जुर्माने में कमी आती है। लेकिन, ₹126.87 करोड़ का यह जुर्माना दर्शाता है कि नियामक सार्वजनिक खरीद प्रक्रियाओं में इस तरह की विकृति को कितनी गंभीरता से लेता है।
निवेशकों के लिए, यह घटनाक्रम नियामकीय जोखिम (Regulatory Risk) और अनुपालन संबंधी जुर्माने के कंपनी की वित्तीय स्थिति पर पड़ने वाले असर को उजागर करता है। यह देखना अहम होगा कि कंपनी भविष्य में अपनी वितरण प्रणाली और सरकारी खरीद प्लेटफार्मों के साथ बातचीत को लेकर क्या आंतरिक बदलाव करती है।
