ब्रोकरेज फर्मों ने SEBI से UPI आधारित स्टॉक ट्रांजैक्शंस के लिए प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) को **2 बेसिस पॉइंट्स** तक सीमित करने का आग्रह किया है। इंडस्ट्री का मानना है कि मौजूदा प्रस्ताव से निवेशकों पर लागत का बोझ बढ़ सकता है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) फिलहाल ब्रोकरेज फर्मों के उस प्रस्ताव पर विचार कर रहा है, जिसमें कैपिटल मार्केट में UPI ट्रांजैक्शंस के लिए प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) ढांचे को बदलने की मांग की गई है। ब्रोकरेज इंडस्ट्री ने मांग की है कि MDR को अधिकतम 2 बेसिस पॉइंट्स पर कैप किया जाए और प्रति ट्रेड ₹2 से ₹5 का फिक्स्ड ट्रांजैक्शन शुल्क रखा जाए।
क्यों चिंतित है ब्रोकरेज इंडस्ट्री?
डेटा के अनुसार, रिटेल कैपिटल मार्केट के लगभग 95% पेमेंट अब UPI के जरिए हो रहे हैं। इनमें से 80% पेमेंट लम्प-सम (lump-sum) ट्रांसफर होते हैं और लगभग 70% ट्रांजैक्शंस ₹2,000 से अधिक के होते हैं।
मौजूदा प्रस्ताव में ₹2,000 तक की राशि को MDR-मुक्त रखा गया है। ब्रोकरों का तर्क है कि यह सीमा वास्तविकता से बहुत कम है। इसे देखते हुए इंडस्ट्री ने मांग की है कि इस छूट की सीमा को बढ़ाकर ₹20,000 किया जाए ताकि रिटेल निवेशकों को राहत मिल सके।
₹300 के कैप पर विवाद
प्रस्तावित ₹300 के ट्रांजैक्शन शुल्क कैप को लेकर भी बहस छिड़ी है। ब्रोकरों का कहना है कि यह कैप कैपिटल मार्केट के लिए बेअसर है। 2% के MDR के हिसाब से यह सीमा ₹15 लाख के ट्रांजैक्शन पर लागू होगी, जबकि UPI की स्टैंडर्ड लिमिट ही ₹5 लाख है। इससे अधिकांश रिटेल ट्रेडर्स पर ऊंचे प्रतिशत-आधारित शुल्क का खतरा बना हुआ है।
इसके अलावा, ब्रोकरों ने 'रनिंग-अकाउंट पेआउट्स' (जो क्लाइंट का अनयूज्ड फंड वापस करने की प्रक्रिया है) को MDR के दायरे से पूरी तरह बाहर रखने की मांग की है। उनका कहना है कि इस पर शुल्क लगाना एक अतिरिक्त परिचालन बोझ होगा। अभी यह केवल एक सिफारिश है; अंतिम फैसला SEBI के नए फ्रेमवर्क के बाद ही स्पष्ट होगा।
