BSE ने निवेशकों को उन इंटरनेशनल ETFs को लेकर सचेत किया है जो अपनी असल वैल्यू (NAV) से काफी महंगे दाम पर ट्रेड कर रहे हैं। विदेशी निवेश की सीमा खत्म होने के कारण नई यूनिट्स नहीं बन पा रही हैं, जिससे मार्केट में सप्लाई की कमी और प्राइस में बड़ा अंतर आ गया है।
प्रीमियम का खेल और रिस्क
जब कोई ETF अपने नेट एसेट वैल्यू (NAV) से काफी ऊंचे दाम पर ट्रेड करता है, तो इसका मतलब है कि मार्केट में उस शेयर की कीमत उसके असली फंड वैल्यू से कहीं ज्यादा है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब भारतीय म्यूचुअल फंड हाउस विदेशी निवेश की अधिकतम सीमा तक पहुंच जाते हैं। चूंकि अब नई यूनिट्स की क्रिएशन रुक गई है, इसलिए बाजार में सप्लाई सीमित है। भारी मांग के चलते कीमतों में कृत्रिम तेजी (Artificial Premium) देखने को मिल रही है।
क्या है बड़ा खतरा?
सबसे बड़ा रिस्क यह है कि मौजूदा कीमतें फंड की परफॉरमेंस पर नहीं, बल्कि सिर्फ मांग-आपूर्ति के असंतुलन (Supply-Demand Mismatch) पर टिकी हैं। अगर भविष्य में विदेशी निवेश की सीमाएं बढ़ती हैं या बाजार का सेंटीमेंट बदलता है, तो यह प्रीमियम रातों-रात गायब हो सकता है। ऐसे में महंगे भाव पर खरीदे गए शेयरों की वैल्यू अचानक गिर सकती है, जिससे निवेशकों को बड़ा कैपिटल लॉस (Capital Loss) हो सकता है।
SEBI का नया एक्शन प्लान
इस गड़बड़ी को रोकने के लिए SEBI ने जून 2026 में गाइडलाइंस जारी की थीं, जिसके तहत अप्रैल 2027 तक ETF के लिए नए प्राइस बैंड लागू कर दिए जाएंगे। नई व्यवस्था में प्राइस बैंड का आधार पिछली क्लोजिंग NAV के करीब रखा जाएगा, ताकि इस तरह की अनैतिक प्रीमियम वाली ट्रेडिंग पर लगाम लगाई जा सके।
निवेशकों के लिए सलाह
जब तक नए नियम पूरी तरह लागू नहीं हो जाते, तब तक इन ETFs में हाई वोलेटिलिटी बनी रहेगी। एक्सचेंज ने साफ कहा है कि खरीदारी का ऑर्डर डालने से पहले फंड हाउस की वेबसाइट पर जाकर करंट NAV जरूर चेक करें। याद रखें, आप अपनी एसेट के लिए जो प्रीमियम चुका रहे हैं, अंत में रिटर्न तो सिर्फ NAV के आधार पर ही मिलेगा।
