BSE ने शेयर बाज़ार में दिन के आखिरी भाव तय करने के तरीके को बेहतर बनाने के लिए एक नया 'क्लोजिंग ऑक्शन सेशन' शुरू किया है। इस सिस्टम का मकसद एक निश्चित क्लोजिंग प्राइस के बजाय नीलामी (Auction) के ज़रिए कीमतों में होने वाली हेरफेर को कम करना है। शुरुआती आंकड़े बताते हैं कि 3 अगस्त को लॉन्च हुए इस सिस्टम ने स्मूथ काम किया और इंडेक्स की वोलैटिलिटी पर खास असर नहीं पड़ा।
BSE का नया 'क्लोजिंग ऑक्शन सेशन'
एशिया के सबसे पुराने स्टॉक एक्सचेंज, BSE (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज) ने सोमवार, 3 अगस्त 2026 को अपना नया 'क्लोजिंग ऑक्शन सेशन' लॉन्च कर दिया है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य सिक्योरिटीज के फाइनल क्लोजिंग प्राइस को तय करने की प्रक्रिया को और बेहतर बनाना है। पहले जहां दिन के अंत में एक निश्चित भाव पर क्लोजिंग होती थी, वहीं अब इसे एक ऑक्शन-बेस्ड सिस्टम से बदला गया है। एक्सचेंज का मानना है कि इससे आखिरी मिनटों में कीमतों में हेरफेर का जोखिम कम होगा और निवेशकों के लिए बेहतर प्राइस डिस्कवरी (Price Discovery) हो सकेगी।
कैसे काम करेगा यह नया सिस्टम?
लॉन्च के पहले दिन, इस नए सिस्टम में 400 से ज़्यादा ट्रेडिंग मेंबर्स ने हिस्सा लिया, जिन्होंने 200 से अधिक सिक्योरिटीज के लिए ट्रेडिंग की। यह प्रक्रिया पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक तय शेड्यूल पर चलती है:
- ऑर्डर एंट्री शाम 3:20 बजे शुरू होती है।
- इसके बाद शाम 3:28 बजे से 3:30 बजे के बीच एक रैंडम ऑक्शन विंडो बंद होती है।
- फाइनल क्लोजिंग रेफरेंस प्राइस शाम 3:32 बजे कैलकुलेट और पब्लिश किया जाता है।
- एक पोस्ट-क्लोजिंग सेशन शाम 3:50 बजे से 4:00 बजे तक चलता है।
डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग पर इस बदलाव का कोई असर नहीं पड़ेगा और वह अपने तय समय 3:40 बजे पर बंद होगी।
शुरुआती प्रदर्शन और डेटा
लॉन्च के दिन के मार्केट डेटा से पता चलता है कि यह मैकेनिज्म उम्मीद के मुताबिक काम कर रहा है। बेंचमार्क SENSEX में शाम 3:15 बजे के रेफरेंस प्राइस से केवल 0.048% का मामूली अंतर दर्ज किया गया। इससे लगता है कि ऑक्शन प्रोसेस ने ट्रांजिशन के दौरान स्थिरता बनाए रखी। यह सिस्टम 'इक्विलिब्रियम प्राइस' (Equilibrium Price) मेथडोलॉजी का इस्तेमाल करता है, जिसमें खरीदारों और विक्रेताओं के ऑर्डर्स को इस तरह मैच किया जाता है कि सबसे ज़्यादा शेयर्स का ट्रेड हो सके। यह तरीका दुनिया भर के कई इक्विटी मार्केट्स में आम है।
रेगुलेटरी अलाइनमेंट और भविष्य की राह
यह कदम BSE की उस प्रतिबद्धता का हिस्सा है जिसके तहत वह सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) के निर्देशों के अनुरूप अपने ट्रेडिंग ऑपरेशंस को बेहतर बना रहा है। एक स्ट्रक्चर्ड ऑक्शन एनवायरनमेंट की ओर बढ़कर, एक्सचेंज का लक्ष्य मार्केट की इंटीग्रिटी को मज़बूत करना है। लिस्टेड कंपनियों की संख्या के हिसाब से दुनिया के सबसे बड़े स्टॉक एक्सचेंज के तौर पर, BSE भारत के फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर में अहम भूमिका निभाता है।
निवेशकों को यह समझना चाहिए कि इस बदलाव से स्टॉक्स के फंडामेंटल वैल्यू पर कोई असर नहीं पड़ेगा, बल्कि यह ऑफिशियल क्लोजिंग प्राइस को तय करने का एक ज़्यादा ट्रांसपेरेंट तरीका प्रदान करेगा। यह क्लोजिंग प्राइस रोज़ाना के परफॉरमेंस बेंचमार्क और कॉन्ट्रैक्ट सेटलमेंट के लिए इस्तेमाल होता है। BSE को उम्मीद है कि आने वाले दिनों में मेंबर्स की भागीदारी और इस नए ऑक्शन विंडो से परिचय बढ़ेगा। बाज़ार सहभागियों के लिए मुख्य बात यह होगी कि भविष्य में इन ऑक्शन विंडो के दौरान कम लिक्विड स्टॉक्स के लिए प्राइस डिस्कवरी कैसे विकसित होती है।
