भारत का ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) सेक्टर अब पहले से कहीं अधिक मजबूत हो गया है। पूर्व SEBI चेयरमैन UK Sinha के अनुसार, अब निवेशकों को एग्जिट (Exit) के लिए बेहतर विकल्प मिल रहे हैं, हालांकि शुरुआती दौर की कंपनियों (Startups) में निवेश की कमी अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।
भारत का ऑल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड (AIF) इंडस्ट्री अब मैच्योरिटी के दौर में पहुंच चुकी है। 14 अक्टूबर 2026 को आयोजित 4th CII AIF समिट में बोलते हुए पूर्व SEBI चेयरमैन UK Sinha ने कहा कि अब मार्केट में लिक्विडिटी की चिंताएं कम हुई हैं। सफल IPOs की बढ़ती संख्या और बाजार के बेहतर तंत्र के कारण निवेशकों के लिए अब अपने निवेश से बाहर निकलना काफी सरल हो गया है।
सेक्टर का बड़ा विस्तार
आज AIF सेक्टर म्यूचुअल फंड्स के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा निवेश सेगमेंट बन चुका है। साल 2026 की शुरुआत तक इस सेक्टर में कुल कमिटमेंट्स लगभग ₹16.9 लाख करोड़ तक पहुंच चुकी हैं। इस विकास को नई रेगुलेटरी अपडेट्स का भी साथ मिला है, जिसमें फंड्स को समेटने (Winding up) की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए 'इनऑपरेटिव फंड' (Inoperative Fund) जैसे स्टेटस पेश किए गए हैं।
स्टार्टअप्स के लिए फंड की कमी
इतनी ग्रोथ के बावजूद, सेक्टर में एक ढांचागत असंतुलन (Structural Imbalance) नजर आता है। UK Sinha ने चिंता जताई कि अधिकांश पूंजी अभी भी सुरक्षित और बाद के चरणों (Later-stage) वाले डील्स में जा रही है। कैटेगरी-I के AIFs, जो खास तौर पर स्टार्टअप्स और इनोवेशन के लिए बने हैं, कुल कमिटमेंट्स का केवल 6.5% से 7% ही हासिल कर पा रहे हैं। यह एक बड़ा गैप है, क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था को शुरुआती दौर के निवेश की सबसे ज्यादा जरूरत है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
निवेशकों को यह समझना होगा कि AIFs और म्यूचुअल फंड्स में जमीन-आसमान का अंतर है। अनलिस्टेड एसेट्स में निवेश होने के कारण इनमें रिस्क अधिक होता है और इसे जल्दी कैश में बदलना अभी भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। भविष्य में इस सेक्टर की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि फंड मैनेजर्स कितनी कुशलता से शुरुआती दौर की कंपनियों को फंड देते हैं और रेगुलेटरी नियमों का पालन करते हुए एग्जिट सुनिश्चित करते हैं।
