एक हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत की टॉप 100 लिस्टेड कंपनियों में से 37 ने अभी भी चेयरमैन और CEO के पद को एक ही व्यक्ति के हाथों में रखा है। यह कॉरपोरेट गवर्नेंस के नजरिए से निवेशकों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
भारत में कॉरपोरेट गवर्नेंस को लेकर निवेशकों की चिंताएं बढ़ रही हैं। Excellence Enablers के हालिया सर्वे के मुताबिक, टॉप 100 लिस्टेड कंपनियों में से 37 ऐसी हैं जहां चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर या CEO का पद एक ही व्यक्ति संभाल रहा है। हालांकि यह पूरी तरह से कानूनी है, लेकिन यह एक ऐसा ढांचा तैयार करता है जहां कंपनी चलाने वाला व्यक्ति खुद उस बोर्ड की निगरानी भी करता है, जो उसके प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है।\n\n### हितों का टकराव (Conflict of Interest)\n\nसबसे बड़ी समस्या हितों के टकराव की है। जब एक ही व्यक्ति के पास मैनेजमेंट और बोर्ड के फैसलों को प्रभावित करने की शक्ति होती है, तो शेयरधारकों के हितों की रक्षा करने वाले चेक एंड बैलेंस कमजोर हो जाते हैं। बोर्ड का काम कंपनी के मैनेजमेंट पर नजर रखना होता है, लेकिन जब मुखिया एक ही हो, तो यह निष्पक्ष निगरानी चुनौतीपूर्ण हो जाती है। यह खासकर फैमिली-रन बिजनेस के लिए अहम है।\n\n### रेगुलेटरी रुख और SEBI की भूमिका\n\nसाल 2020 में SEBI ने कोटक कमेटी की सिफारिशों के आधार पर टॉप 500 कंपनियों के लिए चेयरमैन और CEO के पदों को अलग करना अनिवार्य करने की योजना बनाई थी। हालांकि, कंपनियों की फीडबैक के बाद फरवरी 2022 में इसे 'स्वैच्छिक' (Voluntary) बना दिया गया। अब यह कंपनियों की मर्जी है कि वे इसे लागू करें या नहीं, लेकिन डेटा से पता चलता है कि कई कंपनियां बदलाव की जगह स्थिरता को चुन रही हैं।\n\n### बोर्डरूम में रेड फ्लैग्स\n\nरिपोर्ट में सिर्फ दोहरे पदों का ही मुद्दा नहीं, बल्कि बोर्डरूम की कार्यक्षमता पर भी सवाल उठे हैं। सर्वे में पाया गया कि 21 कंपनियों की बोर्ड मीटिंग्स 30 मिनट से भी कम समय तक चलीं, जो रणनीतिक समीक्षा के लिए पर्याप्त नहीं मानी जातीं। इसके अलावा, 17 कंपनियों ने इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की शर्तों को पूरा करने में कोताही बरती है।\n\n### निवेशकों के लिए संकेत\n\nगवर्नेंस के ये आंकड़े कंपनी की पारदर्शिता को दर्शाते हैं। हालांकि दोहरे पद का मतलब हमेशा खराब प्रदर्शन नहीं होता, लेकिन यह इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की जिम्मेदारी बढ़ा देता है। निवेशकों को बोर्ड मीटिंग्स की अटेंडेंस, इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की भूमिका और कंपनी द्वारा किए गए खुलासों पर पैनी नजर रखनी चाहिए ताकि अकाउंटेबिलिटी का पता चल सके।
