हैदराबाद की टेक कंपनी TakeMe2Space ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उनका PowerBank-50 सैटेलाइट बैटरी Skyroot Aerospace के रॉकेट मिशन में सफलतापूर्वक इस्तेमाल होने के बाद 'स्पेस-प्रूव्ड' हो गया है। यह पहला भारतीय, 'ऑफ-द-शेल्फ' प्रोडक्ट है जो छोटे सैटेलाइट के लिए इंपोर्टेड कंपोनेंट्स पर निर्भरता कम करेगा। मात्र **₹1,04,900** की कीमत वाला यह प्रोडक्ट स्पेस स्टार्टअप्स और रिसर्चर्स के लिए एक किफायती विकल्प है।
स्पेस में भरोसे का नया नाम: PowerBank-50
हैदराबाद की स्टार्टअप TakeMe2Space ने अपने PowerBank-50 सैटेलाइट बैटरी के लिए 'फ्लाइट हेरिटेज' हासिल कर लिया है, जो एयरोस्पेस सेक्टर में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि मानी जाती है। यह सर्टिफिकेशन साबित करता है कि कंपोनेंट स्पेस लॉन्च के मुश्किल हालातों और ऑर्बिट में भरोसेमंद प्रदर्शन कर चुका है। यह बैटरी हाल ही में Skyroot Aerospace के 'Aagaman' मिशन में एक एक्सपेरिमेंटल पेलोड को पावर देने में कामयाब रही।
ऑर्बिट में विश्वसनीयता की कसौटी
स्पेस हार्डवेयर के लिए 'फ्लाइट हेरिटेज' हासिल करना सबसे बड़ी क्वॉलिफिकेशन है। इस मिशन के दौरान, बैटरी 450 किमी की ऊंचाई पर काम करती रही और लॉन्च के दौरान होने वाले वाइब्रेशन, वैक्यूम, रेडिएशन और तापमान के बड़े उतार-चढ़ाव को सफलतापूर्वक झेल गई। PowerBank-50 को लो-अर्थ ऑर्बिट मिशन के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें इंटीग्रेटेड बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम, ठंडे माहौल के लिए सेल हीटर और मॉड्यूलर स्ट्रक्चर शामिल है, जिससे बड़े पावर जरूरतों के लिए कई यूनिट्स को जोड़ा जा सकता है। यह पांच साल तक चलने वाले मिशनों को सपोर्ट करने के लिए बनाई गई है।
इंपोर्टेड कंपोनेंट्स की जगह लेगा भारत का प्रोडक्ट
अब तक, भारत का स्पेस सेक्टर पावर सिस्टम के लिए काफी हद तक इंपोर्टेड कंपोनेंट्स पर निर्भर रहा है, जिनमें लंबा इंतजार और ज्यादा खर्च आता है। ₹1,04,900 की कीमत वाले इस डोमेस्टिक, 'ऑफ-द-शेल्फ' बैटरी को पेश करके, TakeMe2Space सैटेलाइट मैन्युफैक्चरर्स, यूनिवर्सिटी प्रोजेक्ट्स और प्राइवेट स्टार्टअप्स के लिए डेवलपमेंट प्रोसेस को आसान बनाना चाहता है। घरेलू स्पेस इंडस्ट्री के लिए अंतर्राष्ट्रीय सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, जिससे कंपनियां सैटेलाइट्स को और कुशलता से डेवलप और लॉन्च कर सकें।
स्पेस इकोनॉमी के लिए तैयार
PowerBank-50 का सफल डिप्लॉयमेंट कंपनी के लिए एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसकी लॉन्ग-टर्म सफलता स्मॉल-सैटेलाइट इकोसिस्टम से मिलने वाले मार्केट एडॉप्शन और डिमांड पर निर्भर करेगी। इन्वेस्टर्स और इंडस्ट्री के जानकार इस बात पर नज़र रखेंगे कि TakeMe2Space कितनी जल्दी प्रोडक्शन को बढ़ाकर अन्य प्राइवेट स्पेस फर्मों और सरकारी प्रोजेक्ट्स की संभावित मांग को पूरा कर पाती है। इसके अलावा, मिशन सक्सेस को सर्वोपरि मानने वाले सैटेलाइट बिल्डर्स का विश्वास जीतने के लिए कंपनी को भविष्य के कई मिशनों में लगातार प्रदर्शन साबित करना होगा। कंपनी के अगले कदम क्लाइंट बेस का विस्तार करना और बड़े सैटेलाइट प्लेटफॉर्म्स के लिए उच्च क्षमता वाले पावर सॉल्यूशंस विकसित करना हो सकते हैं।
