मानव जीवन की ऊपरी सीमा? DNA म्यूटेशन के कारण 156 साल तक सीमित हो सकती है उम्र!

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AuthorAditya Rao|Published at:
मानव जीवन की ऊपरी सीमा? DNA म्यूटेशन के कारण 156 साल तक सीमित हो सकती है उम्र!

एक नई गणितीय मॉडल (mathematical model) के अनुसार, इंसानों की अधिकतम उम्र करीब **156 साल** हो सकती है। npj Aging में प्रकाशित इस स्टडी में कहा गया है कि DNA में होने वाले रैंडम म्यूटेशन (random DNA mutations) ही उम्र बढ़ने की एक प्राकृतिक सीमा तय कर सकते हैं। यह शोध हृदय और मस्तिष्क जैसे अंगों में सोमैटिक म्यूटेशन (somatic mutations) की भूमिका को समझने में मदद करता है।

Detailed Coverage

उम्र बढ़ने के पीछे DNA की कहानी

वैज्ञानिकों ने मानव जीवन की जैविक सीमाओं को समझने के लिए एक नया गणितीय मॉडल पेश किया है। npj Aging जर्नल में छपी इस स्टडी का मुख्य फोकस सोमैटिक म्यूटेशन पर है। ये DNA में होने वाले वो बदलाव हैं जो हमारे शरीर की कोशिकाओं में जीवन भर जमा होते रहते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर आधुनिक चिकित्सा हर तरह की बीमारियों और मौत के बाहरी कारणों को खत्म भी कर दे, तब भी ये अन avoidable DNA गलतियाँ इंसानी जीवनकाल को औसतन 156 साल तक ही सीमित कर देंगी।

उम्र बढ़ने और DNA डैमेज का गणित

यह स्टडी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया में DNA डैमेज के योगदान को मापने के एक तरीके के तौर पर देखी जा रही है। जब जीवन भर कोशिकाएं विभाजित होती हैं, तो उनके जेनेटिक कोड में गलतियाँ आ जाती हैं। हालांकि शरीर में इन्हें ठीक करने की क्षमता होती है, लेकिन यह हमेशा परफेक्ट नहीं होती और कुछ डैमेज बना रह जाता है। इनमें से ज़्यादातर म्यूटेशन का कोई खास असर नहीं होता, लेकिन कुछ कोशिका के काम को धीरे-धीरे बिगाड़ सकते हैं या कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकते हैं।

शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर असर

यह प्रभाव शरीर के सभी हिस्सों पर एक जैसा नहीं होता। यह मॉडल खासकर उन अंगों पर ध्यान केंद्रित करता है जहाँ कोशिकाएं बहुत कम या बिल्कुल भी नहीं बदल पातीं। लिवर या त्वचा जैसे ऊतकों (tissues) में शरीर क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को बदलकर नई बना सकता है। लेकिन दिल और दिमाग जैसे अंगों में, न्यूरॉन्स और कार्डियोमायोसाइट्स जैसी कोशिकाएं आसानी से दोबारा नहीं बनतीं। इसका मतलब है कि इन जगहों पर DNA डैमेज जमा होता रहता है और दशकों बाद काम करना बंद कर सकता है, जिसे शरीर ठीक नहीं कर पाता।

थ्योरी बनाम असलियत

इस नतीजे पर पहुँचने के लिए, शोधकर्ताओं ने पहले एक ऐसी काल्पनिक स्थिति पर विचार किया जहाँ इंसान बूढ़ा न हो, तो वे 1,700 साल से भी ज़्यादा जी सकते थे। जब उन्होंने इस मॉडल में सोमैटिक म्यूटेशन को शामिल किया, तो अनुमानित जीवनकाल काफी कम होकर 146 से 194 साल की रेंज में आ गया, जिसमें 156 साल का आंकड़ा केंद्रीय अनुमान था।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि शोधकर्ताओं का यह निष्कर्ष भविष्य की कोई पक्की भविष्यवाणी नहीं है। वे इसे उम्र बढ़ने की जटिल पहेली के एक हिस्से को अलग करके समझने का तरीका मानते हैं। स्टडी यह भी मानती है कि सोमैटिक म्यूटेशन उम्र बढ़ने के कई कारणों में से सिर्फ एक है। वैज्ञानिक अब उम्र बढ़ने के अन्य जैविक कारकों को अपने गणितीय मॉडल में शामिल करने की योजना बना रहे हैं ताकि मानव जीवन की सीमाओं को ज़्यादा गहराई से समझा जा सके। यह रिसर्च वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण अंगों की कोशिकाओं को बेहतर ढंग से बचाने या ठीक करने पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकती है, जो जीवन-अवधि विज्ञान (longevity science) और चिकित्सा अनुसंधान का एक अहम क्षेत्र बना हुआ है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.