फलों और शहद से बढ़ा इंसानों का दिमाग? नई रिसर्च ने बदली सोच!

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AuthorNeha Patil|Published at:
फलों और शहद से बढ़ा इंसानों का दिमाग? नई रिसर्च ने बदली सोच!

सिडनी और ग्लासगो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिसर्च बताती है कि फलों और शहद जैसे प्राकृतिक शुगर ही इंसानों के दिमाग के विकास के लिए सबसे ज़रूरी थे। इसने सदियों पुरानी मांस-केंद्रित विकास की थ्योरी को चुनौती दी है।

दिमाग के विकास का नया सच

इवोल्यूशन (Evolution) पर हुई एक नई स्टडी हमारे पूर्वजों के विकास को देखने का नजरिया बदल रही है। सिडनी और ग्लासगो यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि पिछले 40 लाख सालों में इंसानी दिमाग के बड़े आकार के पीछे का मुख्य कारण फलों और शहद से मिलने वाली सिंपल शुगर थी।

मांस-केंद्रित थ्योरी को टक्कर

लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि इंसानी विकास में जानवरों के मांस का सेवन और शिकार का अहम रोल रहा है। लेकिन यह नई रिसर्च कहती है कि दिमाग को एनर्जी देने के लिए जरूरी ग्लूकोज (Glucose) की भारी मात्रा सिर्फ मांस से पूरी नहीं हो सकती थी। जैसे-जैसे इंसानों का दिमाग 300 ग्राम से बढ़कर आज के 1500 ग्राम के करीब पहुंचा, उसे दोगुनी एनर्जी की ज़रूरत पड़ी, जो सिर्फ मीठे फलों और शहद से ही मुमकिन थी।

ग्लूकोज की ज़रूरत को समझना

स्टडी में वैज्ञानिकों ने शुरुआती इंसानों के दिमाग के आकार और उनकी ग्लूकोज की ज़रूरत का मॉडल तैयार किया। पता चला कि जैसे-जैसे दिमाग बढ़ा, उसे तुरंत एनर्जी देने वाले सोर्स की ज़रूरत बढ़ी। प्राकृतिक शुगर ने यह ज़रूरत इंसानों के आग पर पकाकर खाना (जैसे स्टार्च वाली जड़ें या अनाज) सीखने से बहुत पहले ही पूरी कर दी थी। इससे पता चलता है कि शुगर पर हमारी निर्भरता सिर्फ आज की नहीं, बल्कि दिमाग के विकास के अहम पड़ावों पर एक ज़रूरत थी।

मांस से आगे की सोच

रिसर्च की लीड ऑथर, प्रोफेसर जेनी ब्रांड-मिलर ने कहा कि इवोल्यूशनरी स्टडीज में अक्सर प्रोटीन (जैसे मांस से मिलने वाला) पर जोर दिया जाता है, लेकिन दिमाग की कार्बोहाइड्रेट्स की खास ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किया गया। दिमाग एक भारी एनर्जी इस्तेमाल करने वाला ऑर्गन है, और हमारे विकास के बड़े हिस्से में यह कार्बोहाइड्रेट्स, यानी जंगली फल और शहद से मिलने वाली एनर्जी ही उसका मुख्य फ्यूल थी।

को-ऑथर प्रोफेसर कैरेन हार्डी ने यह भी बताया कि कच्चा स्टार्च पचाना इंसानों के लिए मुश्किल था। इसलिए, शुरुआती इंसानों को अपनी एनर्जी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मीठे पौधों पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर, बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं के लिए यह ज़रूरी था, क्योंकि भ्रूण के विकास और दूध बनाने में ग्लूकोज की भारी मात्रा लगती है।

इंसानी बायोलॉजी को समझने के मायने

यह रिसर्च जीवाश्मों (Fossils), जेनेटिक्स और मेटाबोलिक मॉडलिंग जैसे कई डेटा को जोड़ती है। यह बताती है कि क्यों इंसानों को मीठे स्वाद की इतनी तीव्र चाहत होती है। यह शायद एक सर्वाइवल मैकेनिज्म (Survival Mechanism) था, जिसने ऐसे इंसानों को फायदा पहुंचाया जो बढ़ते दिमाग के लिए एनर्जी सोर्स को कुशलता से ढूंढ पाते थे।

आगे चलकर, वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करेंगे कि हमारे ये प्राचीन मेटाबोलिक पैटर्न (Metabolic Patterns) आज की डाइट और हेल्थ से कैसे जुड़े हैं। यह स्टडी बीते कल को समझने के साथ-साथ इस बात पर भी चर्चा खोलती है कि इंसानी मेटाबोलिज्म लाखों सालों में अलग-अलग माहौल और खाने की उपलब्धता के हिसाब से कैसे बदला।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.