अंतरिक्ष तकनीक स्टार्टअप GalaxEye अगले **24 महीनों** में दो नए एडवांस्ड OptoSAR सैटेलाइट लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। यह फैसला कंपनी के पहले मिशन 'ड्रिष्टि' की विफलता के बाद आया है, जो इस साल की शुरुआत में ऑर्बिट में संचार समस्याओं के कारण खो गया था।
मिशन 'ड्रिष्टि' की विफलता का असर
GalaxEye का पहला मिशन, 'मिशन ड्रिष्टि', 3 मई 2026 को लॉन्च किया गया था। इसका उद्देश्य ऑप्टिकल और रडार इमेजिंग क्षमताओं को एक ही प्लेटफॉर्म पर एकीकृत करने वाला दुनिया का पहला सैटेलाइट बनना था। सैटेलाइट ऑर्बिट में स्थापित हो गया था और ग्राउंड से संपर्क भी स्थापित हो गया था, लेकिन बाद के चरणों में एक गंभीर समस्या उत्पन्न हुई। कंपनी ने बताया कि एक अत्यधिक सौर तूफान से उत्पन्न तीव्र विकिरण ने महत्वपूर्ण ऑनबोर्ड सिस्टम को नुकसान पहुंचाया, जिससे सैटेलाइट का संपर्क टूट गया। सैटेलाइट को ठीक करने के सभी प्रयास विफल रहे हैं, जिस कारण टीम अब भविष्य के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
इन-हाउस मैन्युफैक्चरिंग की ओर रणनीति में बदलाव
अपनी पहली मिशन में आई तकनीकी चुनौतियों के बाद, GalaxEye अब वर्टिकल इंटीग्रेशन की ओर बढ़ रहा है। कंपनी के फाउंडर और सीईओ, सुयश सिंह ने बताया कि पहले मिशन से मिले इंजीनियरिंग डेटा का उपयोग आने वाले स्पेसक्राफ्ट के आर्किटेक्चर को फिर से डिजाइन करने के लिए किया जा रहा है। कंपनी अपनी सप्लाई चेन, डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग प्रक्रियाओं को बड़े पैमाने पर इन-हाउस लाकर बाहरी विक्रेताओं पर अपनी निर्भरता कम करना चाहती है। इसका लक्ष्य सैटेलाइट की गुणवत्ता पर अधिक नियंत्रण हासिल करना और सौर विकिरण जैसी पर्यावरणीय खतरों के खिलाफ हार्डवेयर की मजबूती को बेहतर बनाना है।
भविष्य की राह और अगले कदम
निवेशक और हितधारक इस बात पर नज़र रखेंगे कि इन-हाउस मैन्युफैक्चरिंग में यह बदलाव कंपनी के पूंजी आवंटन और प्रोजेक्ट की समय-सीमा को कैसे प्रभावित करता है। अंतरिक्ष तकनीक वेंचर्स को अक्सर शुरुआती लॉन्च चरणों में उच्च तकनीकी जोखिमों का सामना करना पड़ता है, लेकिन इन अगले दो मिशनों को सफलतापूर्वक पूरा करने की क्षमता GalaxEye की डुअल-इमेजिंग तकनीक में ग्राहकों का विश्वास बनाने के लिए महत्वपूर्ण होगी। अगले 24 महीनों में कंपनी का मुख्य ध्यान इन नए सैटेलाइट्स के सफल विकास, परीक्षण और परिनियोजन पर रहेगा, साथ ही अपनी उत्पादन अवसंरचना को आंतरिक बनाने से जुड़ी बढ़ी हुई लागतों का प्रबंधन भी करना होगा।
