Harvard Business School की नई रिसर्च में 'Architect, Bridger, Catalyst' मॉडल पर जोर दिया गया है। यह 'Lone Hero' CEO के दौर से हटकर कोलैबोरेटिव स्ट्रक्चर की ओर इशारा है, जो लंबी अवधि में किसी कंपनी की ग्रोथ और स्टेबिलिटी के लिए बेहद जरूरी है।
'Lone Hero' CEO के युग का अंत
कॉर्पोरेट जगत में अब लीडरशिप का मतलब केवल एक करिश्माई CEO तक सीमित नहीं रह गया है। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल की लेटेस्ट रिसर्च 'Genius at Scale' बताती है कि बड़ी कंपनियों के लिए अब 'डायरेक्टिव मैनेजमेंट' की जगह 'एनवायरमेंटल ऑर्केस्ट्रेशन' का समय आ गया है। निवेशकों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि वे सिर्फ टॉप लीडर पर निर्भर न रहकर कंपनी के इंटरनल सिस्टम को देखें।
क्या है ये ABC लीडरशिप फ्रेमवर्क?
रिसर्च में लीडरशिप के तीन मुख्य स्तंभ बताए गए हैं:
- Architect (आर्किटेक्ट): ये लीडर्स इनोवेशन के लिए सही माहौल तैयार करते हैं, न कि खुद समाधान थोपते हैं।
- Bridger (ब्रिजर): ये अलग-अलग टीमों और आइडियाज को जोड़ते हैं, जिससे बड़ी कंपनियों में आने वाली 'साइलो' (Silo) की समस्या खत्म होती है।
- Catalyst (कैटालिस्ट): ये कर्मचारियों को रिस्क लेने और गलतियों से सीखने का साहस देते हैं।
Pfizer और Procter & Gamble जैसी दिग्गज कंपनियां अब इसी दिशा में काम कर रही हैं। यहां फोकस 'कम बोलने' और 'ज्यादा सवाल पूछने' पर है ताकि टीम की क्रिएटिविटी न दबे।
शेयरधारकों के लिए क्यों है जरूरी?
एक कंपनी जो सिर्फ एक विजनरी लीडर पर टिकी है, वह शॉर्ट टर्म में तो चमक सकती है, लेकिन लंबे समय में उसमें 'Key Person Risk' बना रहता है। अगर वह लीडर कंपनी छोड़ दे, तो बिजनेस लड़खड़ा सकता है।
निवेशकों को एनुअल रिपोर्ट्स और मैनेजमेंट कमेंट्री में अब यह खोजना चाहिए कि क्या कंपनी में 'डिसेंट्रलाइज्ड डिसीजन मेकिंग' (Decentralized Decision Making) हो रही है? क्या लीडरशिप कोचिंग में निवेश किया जा रहा है? जो कंपनियां इन बदलावों को अपना रही हैं, वे मार्केट के उतार-चढ़ाव और रेगुलेटरी चुनौतियों को झेलने में अधिक सक्षम होती हैं।
