TCG एसेट मैनेजमेंट के CEO शहजाद मडन का मानना है कि मार्केट सेंटिमेंट भले ही कमजोर दिख रहा हो, लेकिन भारतीय कॉर्पोरेट की कमाई की रफ्तार दमदार है। डिफेंस, मैन्युफैक्चरिंग और एनर्जी ट्रांजिशन जैसे सेक्टर लंबे समय तक ग्रोथ के इंजन बने रहेंगे।
बाजार और असलियत का अंतर
इन्वेस्टर्स के लिए फिलहाल बाजार का मूड और कंपनियों का असली परफॉर्मेंस, दोनों के बीच का अंतर देखना बहुत जरूरी है। TCG एसेट मैनेजमेंट के CEO शहजाद मडन के मुताबिक, हाल के दिनों में मार्केट कॉन्फिडेंस थोड़ा ठंडा हुआ है, लेकिन भारतीय कंपनियों की अंडरलाइंग अर्निंग्स ग्रोथ अब भी बहुत मजबूत बनी हुई है। इसका मतलब यह है कि शॉर्ट-टर्म में शेयर की कीमतों में होने वाली उठा-पटक का बिजनेस के फंडामेंटल्स से कोई सीधा संबंध नहीं है।
कहां है ग्रोथ का दम?
स्ट्रक्चरल ग्रोथ ऐसे चुनिंदा सेक्टर्स से आ रही है जो ग्लोबल हालात पर कम निर्भर हैं। 'इंडिजनाइजेशन' यानी स्वदेशी डिफेंस प्रोडक्शन की मुहिम से स्थानीय कंपनियों के पास ऑर्डर्स की भरमार है। इसी तरह, सोलर, विंड और इलेक्ट्रिक व्हीकल इंफ्रास्ट्रक्चर की तरफ शिफ्ट होने से बड़े स्तर पर कैपिटल स्पेंडिंग के मौके बन रहे हैं। जब इसे मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के साथ जोड़ते हैं, तो एक ऐसा मजबूत आधार तैयार होता है जो ग्लोबल अस्थिरता के बावजूद कॉर्पोरेट मुनाफे को सहारा देता है।
ये हैं चिंता के विषय
हालांकि, यह ग्रोथ स्टोरी पूरी तरह बाधाओं से मुक्त नहीं है। सबसे बड़ा रिस्क एल नीनो (El Niño) है, जो बारिश को प्रभावित कर फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे फूड इन्फ्लेशन बढ़ने का खतरा है। अगर खाने-पीने की चीजें महंगी बनी रहती हैं, तो सेंट्रल बैंक को महंगाई काबू करने के लिए ब्याज दरों (Interest Rates) को लंबे समय तक ऊंचा रखना पड़ सकता है। इससे बिजनेस की उधार लेने की लागत बढ़ेगी और ग्रामीण इलाकों में कंज्यूमर स्पेंडिंग पर असर पड़ सकता है।
निवेशकों के लिए सलाह
महंगाई के दबाव के कारण, बॉन्ड जैसे फिक्स्ड-इनकम निवेश अब बाजार की अस्थिरता से पहले जैसा बचाव नहीं दे पा रहे हैं। इसलिए, निवेशकों का ध्यान ब्रॉड मार्केट के बजाय कंपनी-स्पेसिफिक आंकड़ों पर होना चाहिए। उन कंपनियों को चुनें जिनके पास मजबूत बैलेंस शीट, कॉम्पिटिटिव एडवांटेज और अनुभवी मैनेजमेंट टीम है। आने वाले कुछ महीने बेहद अहम हैं, क्योंकि सेकंड क्वार्टर के नतीजों से यह साफ हो जाएगा कि क्या शेयर की मौजूदा कीमतें असली कमाई के दम पर हैं या सिर्फ उम्मीदों के गुब्बारे पर टिकी हैं।
