MFs का ब्रेक, FPIs की वापसी
फरवरी में डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड्स (MFs) की इक्विटी खरीदारी में भारी कमी आई। यह घटकर ₹10,381 करोड़ पर आ गई, जो पिछले तीन सालों में सबसे निचला स्तर है। जनवरी में यह आंकड़ा ₹42,355 करोड़ था। इस सुस्ती की मुख्य वजह इक्विटी स्कीम्स में कम इनफ्लो और बाजार की बढ़ती वोलैटिलिटी है। हालांकि, फंड मैनेजर्स अब बेहतर वैल्यूएशन पर पैसा लगाने के लिए कैश होल्डिंग्स बढ़ा रहे हैं। Quant Mutual Fund जैसे फंड्स ने भी इक्विटी एक्सपोजर को निचले स्तरों पर फिर से बनाने के इरादे से अपनी कैश पोजीशन बढ़ाई है।
भू-राजनीतिक तनाव और AI का दोहरी मार
फरवरी और मार्च 2026 की शुरुआत में, बाजार पर दो बड़े झटके महसूस किए गए: पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और आईटी सेक्टर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का संभावित disruptive प्रभाव। पश्चिम एशिया में संघर्ष ने क्रूड ऑयल की कीमतों को बढ़ाया, भारतीय रुपये पर दबाव डाला और इंडिया VIX (मार्केट वोलैटिलिटी इंडेक्स) को ऊपर ले गया। साथ ही, यह डर भी सता रहा है कि जनरेटिव AI मुख्य आईटी सेवाओं को ऑटोमेट कर सकता है, जिससे भारतीय आईटी सेक्टर की री-रेटिंग हुई है और वैल्यू में बड़ी गिरावट आई है। ग्लोबल ब्रोकरेज फर्मों ने प्रमुख आईटी प्लेयर्स को डाउनग्रेड किया है, AI के मौजूदा बिज़नेस मॉडल को disrupt करने और ट्रेडिशनल आउटसोर्सिंग सेवाओं की मांग कम करने की आशंका के चलते रेवेन्यू ग्रोथ में कमी का अनुमान जताया है।
विश्लेषकों की राय और वैल्यूएशन
इस अनिश्चितता के बावजूद, भारत के इक्विटी आउटलुक पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। Morgan Stanley एक बुलिश थीसिस पेश कर रहा है, उनका मानना है कि यह मार्केट डाउनटर्न किसी स्ट्रक्चरल समस्या के कारण नहीं, बल्कि टेक्निकल 'मार्केट प्लंबिंग' इश्यूज के कारण है, जो उच्च-गुणवत्ता वाले व्यवसायों को उचित दामों पर खरीदने का बड़ा अवसर प्रदान करता है। ब्रोकरेज ने दिसंबर 2026 तक Sensex के लिए 95,000 का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। इसके विपरीत, Kotak Institutional Equities अधिक संतुलित नजरिया अपना रहा है। वे अर्निंग्स ग्रोथ की संभावना को स्वीकार करते हैं, लेकिन पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष जैसे भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति आगाह करते हैं, जो उच्च ऊर्जा कीमतों के माध्यम से भारत के मैक्रो एनवायरनमेंट को प्रभावित कर सकते हैं। वे बताते हैं कि भारतीय इक्विटी, अपने पीक्स से कम होने के बावजूद, अभी भी क्षेत्रीय साथियों की तुलना में प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं। 2 मार्च 2026 तक, Nifty का प्राइस-टू-अर्निंग्स (P/E) रेशियो लगभग 22.32 था, जो अपने पांच साल के औसत से थोड़ा कम है, लेकिन कई एशियाई बाजारों से ऊपर है।
हाइब्रिड फंड्स में बढ़ रही इक्विटी एलोकेशन
जहां सीधे म्यूचुअल फंड इक्विटी खरीदारी कम हुई है, वहीं हाइब्रिड फंड्स इक्विटी में अपना एलोकेशन बढ़ा रहे हैं क्योंकि हालिया मार्केट करेक्शन ने वैल्यूएशन को बेहतर बनाया है। डेटा विश्लेषण बताता है कि बैलेंस्ड एडवांटेज फंड्स (BAFs) और मल्टी-एसेट स्कीम्स में इक्विटी एक्सपोजर धीरे-धीरे बढ़ रहा है। यह वोलैटिलिटी के बीच संतुलित, डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो की ओर एक स्ट्रैटेजिक बदलाव का संकेत देता है। हाइब्रिड और गोल्ड ETFs की ओर यह रुझान वर्तमान अनिश्चित माहौल में स्टेबिलिटी और डायवर्सिफिकेशन के लिए निवेशकों की पसंद को दर्शाता है।
जोखिमों से निपटने की जरूरत
वर्तमान बाजार में कई स्ट्रक्चरल और साइक्लिकल जोखिम हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है। पश्चिम एशिया में लंबे समय तक भू-राजनीतिक अस्थिरता उच्च क्रूड ऑयल कीमतों को बनाए रख सकती है, जिससे भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट और इंफ्लेशनरी प्रेशर को और बढ़ाया जा सकता है। डेप्रिशिएटिंग इंडियन रुपया इंपोर्ट लागत को बढ़ाता है और मॉनेटरी पॉलिसी के आउटलुक को और जटिल बनाता है। इसके अलावा, आईटी सर्विसेज सेक्टर के लिए AI का स्ट्रक्चरल खतरा कम नहीं आंका जाना चाहिए; रेवेन्यू डिफ्लेशन और जॉब डिस्प्लेसमेंट के डर से सेक्टर-विशिष्ट करेक्शन हो सकते हैं और भारत के एक्सटर्नल अकाउंट्स को प्रभावित कर सकते हैं। हालिया गिरावट के बावजूद, भारतीय इक्विटी क्षेत्रीय साथियों की तुलना में अपेक्षाकृत महंगी बनी हुई हैं, जो दर्शाता है कि मार्केट का प्रीमियम लगातार अर्निंग्स मोमेंटम और अनुकूल ग्लोबल कैपिटल फ्लो पर निर्भर है। पॉलिसी में कोई चूक या भू-राजनीतिक घटनाओं का बढ़ना सकारात्मक सेंटिमेंट को तुरंत पलट सकता है, जो वर्तमान बाजार सेटअप की नाजुकता को उजागर करता है।