वेल्थ मैनेजमेंट सेक्टर में बंपर उछाल! 2030 तक ₹1.7 ट्रिलियन पार, जानिए क्या है वजह

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AuthorAditya Rao|Published at:
वेल्थ मैनेजमेंट सेक्टर में बंपर उछाल! 2030 तक ₹1.7 ट्रिलियन पार, जानिए क्या है वजह

भारत का एसेट और वेल्थ मैनेजमेंट (AWM) सेक्टर 2030 तक अपनी संपत्ति को दोगुना कर करीब **$1.7 ट्रिलियन** तक पहुंचाने वाला है। यह अनुमान PwC की एक रिपोर्ट में सामने आया है। इस ग्रोथ की मुख्य वजह रिटेल एसआईपी (SIP) में लगातार बढ़त, संस्थागत निवेशकों की बढ़ती भागीदारी और गिफ्ट सिटी (GIFT City) का विकास है।

क्या है खास?

PwC की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का एसेट और वेल्थ मैनेजमेंट (AWM) सेक्टर 2030 तक $1.7 ट्रिलियन की असेट्स अंडर मैनेजमेंट (AuM) तक पहुँच जाएगा। यह 2024 के $0.9 ट्रिलियन के आंकड़े से लगभग दोगुना होगा। यानी, आने वाले सालों में इस सेक्टर में सालाना 11.6% की ग्रोथ देखने को मिल सकती है, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र की अनुमानित 6.8% ग्रोथ से कहीं ज़्यादा है। यह जबरदस्त वृद्धि इस बात का संकेत है कि भारतीय अब अपनी बचत को बैंकों में रखने के बजाय म्यूचुअल फंड और इक्विटी जैसे औपचारिक निवेश साधनों में डाल रहे हैं।

लिस्टेड कंपनियों पर क्या होगा असर?

इस बंपर ग्रोथ का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ेगा जो भारत के फाइनेंशियल इकोसिस्टम की रीढ़ हैं। जैसे-जैसे ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय परिवार बाज़ारों में निवेश करेंगे – जैसा कि 192 मिलियन डीमैट खातों और लगातार आने वाले एसआईपी (SIP) इनफ्लो से पता चलता है – इन ट्रांजैक्शन को संभव बनाने वाली कंपनियों के लिए यह एक बड़ा मौका होगा।

लिस्टेड एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (AMCs), जो मैनेज की जा रही कुल संपत्ति पर फीस कमाती हैं, इस ट्रेंड की सीधी लाभार्थी होंगी। इसी तरह, रजिस्ट्रार और ट्रांसफर एजेंट, जो म्यूचुअल फंड के लिए बैक-एंड टेक्नोलॉजी और रिकॉर्ड-कीपिंग का काम संभालते हैं, उनके बिज़नेस में भी ज़बरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। इसके अलावा, सेंट्रल डिपोज़िटरीज़, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप में सिक्योरिटीज रखती हैं, उन्हें डीमैट खातों और सक्रिय निवेशकों की बढ़ती संख्या से फायदा होगा।

ग्रोथ के दो रास्ते

इस सेक्टर में दो अलग-अलग तरह के ग्राहक वर्ग उभर रहे हैं। एक तरफ, बड़ी संख्या में डिजिटल-सेवी रिटेल निवेशक हैं, जो मोबाइल-फर्स्ट ऐप और डिस्काउंट ब्रोकरों के ज़रिए निवेश कर रहे हैं। ये निवेशक लगातार एसआईपी (SIP) में पैसा डाल रहे हैं, और नए रजिस्ट्रेशन में 40% से ज़्यादा छोटे शहरों (Tier 2, 3, और 4) से आ रहे हैं।

दूसरी तरफ, संस्थागत निवेशक – जैसे कि ईपीएफओ (EPFO) और नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) – इक्विटी और अल्टरनेटिव एसेट्स में ज़्यादा पैसा लगा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, एनपीएस (NPS) का लक्ष्य 2030 तक $1 ट्रिलियन की संपत्ति तक पहुँचना है। इसके अलावा, अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स (AIFs) और प्राइवेट क्रेडिट फंड्स भी बढ़ रहे हैं, क्योंकि निवेशक पारंपरिक स्टॉक और बॉन्ड से हटकर रिटर्न की तलाश में हैं।

गिफ्ट सिटी का रोल

गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी (GIFT City) इस ग्रोथ में एक अहम भूमिका निभा रहा है। एक ग्लोबल फाइनेंशियल हब के तौर पर, यह फंड मैनेजमेंट कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय पूंजी को आकर्षित कर रहा है। इसका मकसद ग्लोबल निवेशकों और भारतीय बाज़ार के अवसरों के बीच की खाई को पाटना है, जिससे देश में विदेशी संस्थागत पूंजी का प्रवाह बढ़ सके।

जोखिम और निवेशकों के लिए ज़रूरी बातें

हालांकि ग्रोथ का अनुमान बहुत अच्छा है, लेकिन इस सेक्टर को असली चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा। PwC की रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि सेक्टर को अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचने के लिए बेहतर गवर्नेंस, मज़बूत निवेशक सुरक्षा और उच्च-गुणवत्ता वाली सलाह की ज़रूरत होगी।

निवेशकों को यह देखना होगा कि SEBI जैसे रेगुलेटरी निकाय इस तेज़ ग्रोथ को कैसे संभालते हैं। गलत बिक्री (Mis-selling) को रोकने, AIFs में पारदर्शिता बढ़ाने और फाइनेंशियल इन्फ्लुएंसर्स को रेगुलेट करने पर रेगुलेटरी फोकस सेक्टर के भविष्य को आकार दे सकता है। इसके अलावा, रिटेल एसआईपी (SIP) इनफ्लो की निरंतरता बाज़ार के सेंटीमेंट पर बहुत निर्भर करती है; बाज़ार में लंबे समय तक की अस्थिरता निवेशकों के धैर्य की परीक्षा ले सकती है और रिडेम्पशन रेट (Redemption Rate) बढ़ा सकती है।

निवेशकों के लिए मुख्य बातों में एसआईपी (SIP) इनफ्लो पर AMFI का मासिक डेटा, इक्विटी में संस्थागत पूंजी आवंटन की रफ़्तार और AIFs तथा डिस्ट्रिब्यूशन फीस को लेकर कोई भी बड़े रेगुलेटरी अपडेट शामिल हैं।

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