लगातार 8 हफ्तों की गिरावट के बाद भारतीय शेयर बाजार में रिकवरी देखने को मिल रही है। नई एकेडमिक रिसर्च में सामने आया है कि अक्टूबर में अक्सर क्यों ज्यादा अस्थिरता (volatility) रहती है और निवेशक अब RBI की पॉलिसी व ग्लोबल डेटा पर नजर बनाए हुए हैं।
भारतीय शेयर बाजार में 5 अक्टूबर, 2026 से सुधार के संकेत दिख रहे हैं, जिससे निवेशकों को थोड़ी राहत मिली है। निफ्टी (Nifty) अब 22,500 के स्तर के ऊपर कारोबार कर रहा है, जबकि सेंसेक्स (Sensex) में 350 अंकों से ज्यादा की बढ़त दर्ज की गई है। इस तेजी के पीछे अमेरिका से आए ठंडे जॉब डेटा और फेडरल रिजर्व के रेट हाइक को लेकर कम होता डर मुख्य वजह है।
अक्टूबर में बाजार का मिजाज क्यों बिगड़ता है?
यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया की जेसिका वाचर और हांगकांग यूनिवर्सिटी के होंगये गुओ की रिसर्च 'Correlation Neglect in Asset Prices' में एक दिलचस्प बात सामने आई है। रिसर्च के मुताबिक, निवेशक अक्सर तिमाही के दूसरे महीने में पुरानी जानकारी को नया समझकर ओवररिएक्ट (overreact) करते हैं। चूंकि कंपनियां तिमाही के पहले महीने में ही अपना ज्यादातर फाइनेंशियल डेटा जारी कर देती हैं, इसलिए दूसरे महीने में आई खबरों पर बाजार का रिएक्शन जरूरत से ज्यादा होता है, जो अक्टूबर में अक्सर बड़ी उठापटक का कारण बनता है।
घरेलू और ग्लोबल चुनौतियां
बाजार के व्यवहार के अलावा, भारतीय बाजार पर अभी भी कुछ बड़े दबाव बने हुए हैं। हालिया गिरावट की बड़ी वजह FIIs की तरफ से लगातार बिकवाली और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का 5% से ऊपर बने रहना था।
निवेशक अब 5 से 7 अक्टूबर के बीच होने वाली RBI की पॉलिसी मीटिंग पर नजर गड़ाए हुए हैं। महंगाई के दबाव के बीच ब्याज दरों पर केंद्रीय बैंक का रुख बेहद अहम होगा। इसके अलावा, वेस्ट एशिया में जारी तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है, जो भारत के इंपोर्ट बिल और कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन के लिए चिंता का विषय है।
आगे क्या होगा?
बाजार की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि वह इन मनोवैज्ञानिक पैटर्न और कठिन मैक्रो डेटा को कैसे मैनेज करता है। टेक्निकल एक्सपर्ट्स की नजर निफ्टी के 22,600 के करीब स्थित 200-वीक मूविंग एवरेज पर है। आने वाले दिनों में Q2 के नतीजे यह तय करेंगे कि कंपनियों ने बढ़ती लागत के बीच अपने मुनाफे को कैसे सुरक्षित रखा है।
