डीमर्जर क्यों काम करते हैं: होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट का खेल
दरअसल, कई बड़ी कंपनियों में 'होल्डिंग कंपनी डिस्काउंट' की समस्या होती है। इसका मतलब है कि कंपनी का कुल मिलाकर जो वैल्यूएशन होता है, वह उसके अलग-अलग बिजनेस यूनिट्स की कुल वैल्यू से कम होता है। InGovern की एनालिसिस बताती है कि यह डिस्काउंट औसतन 32% तक का हो सकता है। इसकी वजहें अक्सर कंपनी की कॉम्प्लेक्स स्ट्रक्चर, अलग-अलग बिजनेस में कैपिटल एलोकेशन की अनिश्चितता और पारदर्शिता की कमी होती है। सरल और 'प्योर-प्ले' स्ट्रक्चर इन दिक्कतों को दूर करने में मदद करते हैं, जिससे इन्वेस्टर्स हर बिजनेस यूनिट को उसकी सही वैल्यू पर आंक सकते हैं।
मिले-जुले नतीजे: कहीं सफलता, कहीं मायूसी
प्रॉक्सी एडवाइजर ने कुछ सफल डीमर्जर के उदाहरण भी दिए, जैसे Adani Enterprises, Raymond, Jubilant Pharmova और Siemens। इन कंपनियों ने डीमर्जर के बाद काफी वैल्यू अनलॉक की। हालांकि, स्टडी में यह भी सामने आया कि हर रीस्ट्रक्चरिंग कामयाब नहीं होती। Piramal Enterprises, Aarti Industries, Tata Motors और ITC Hotels जैसी कंपनियां डीमर्जर के बाद बाज़ार के मुकाबले पिछड़ती दिखीं। इससे साफ है कि डीमर्जर की सफलता एग्जीक्यूशन (Execution) और स्ट्रैटेजिक फिट (Strategic Fit) पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती है।
UPL का प्रस्तावित डीमर्जर
InGovern की ये फाइंडिंग्स ऐसे समय में आई हैं जब एग्रोकेमिकल्स कंपनी UPL Limited अपने कॉरपोरेट स्ट्रक्चर को बदलने की तैयारी में है। कंपनी की योजना अपने इंडिया क्रॉप प्रोटेक्शन यूनिट और ग्लोबल क्रॉप प्रोटेक्शन प्लेटफॉर्म को एक नई एंटिटी, UPL Global में अलग करने की है। बाकी बची UPL एंटिटी में स्पेशलिटी केमिकल्स, सुपरफॉर्म मैन्युफैक्चरिंग और Advanta Seeds में उसकी हिस्सेदारी शामिल होगी। इस कदम से कंपनी का स्ट्रक्चर सरल होगा और इन्वेस्टर्स के लिए चीजें ज़्यादा स्पष्ट होने की उम्मीद है।
