तेल के तेज़ दाम और विदेशी बिकवाली से बाज़ार पर दबाव
दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आई ज़बरदस्त तेज़ी भारतीय शेयर बाज़ार के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) के दाम $100 से $120 प्रति बैरल के करीब पहुंचने से भारत जैसे ऊर्जा आयात करने वाले देशों में महंगाई बढ़ने, चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) के चौड़े होने और रुपये में कमजोरी आने का खतरा मंडरा रहा है।
इस बीच, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) का भारत से पैसा निकालने का सिलसिला जारी है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 में अकेले ₹1.14 से ₹1.22 लाख करोड़ का आउटफ्लो देखा गया, जो कुल मिलाकर इस साल ₹1.27 लाख करोड़ से अधिक हो चुका है। यह लगातार बिकवाली बाज़ार पर दबाव बना रही है, जिसका असर Nifty 50 इंडेक्स पर भी दिख रहा है, जो साल-दर-साल 9% से 14.5% तक गिर चुका है और फिलहाल 22,250-22,300 के स्तर पर कारोबार कर रहा है। भारत का कुल मार्केट कैप भी इस साल $533 बिलियन से ज़्यादा घट गया है।
बड़े ब्रोकरेज हाउस ने बदली राय, कहीं दिखी उम्मीद
इन वैश्विक और घरेलू दबावों को देखते हुए कई बड़ी वित्तीय संस्थाओं ने अपने अनुमानों में बदलाव किया है। Goldman Sachs ने भारतीय शेयरों की रेटिंग को 'Overweight' से घटाकर 'Marketweight' कर दिया है और Nifty के लिए 12 महीने का टारगेट 25,900 कर दिया है। साथ ही, 2026 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान भी 16% से घटाकर 8% कर दिया है। वहीं, Nomura ने भी 'Neutral' रेटिंग देते हुए Nifty टारगेट को 15% घटाकर 24,900 कर दिया है, जो पहले 29,300 था। UBS ने भी भारतीय शेयरों को 'Neutral' कर दिया है।
हालांकि, हर कोई मंदी के सुर में नहीं बोल रहा। Jefferies जैसी फर्म भारतीय बाज़ार को लेकर अभी भी पॉजिटिव हैं। उनका दिसंबर 2026 तक Nifty टारगेट 28,300 है। वे उम्मीद कर रहे हैं कि कंपनियों के नतीजों में रिकवरी आएगी और फाइनेंशियल ईयर 27 तक 13-14% की अर्निंग ग्रोथ देखने को मिल सकती है। खास तौर पर बैंकिंग और फार्मा जैसे सेक्टर्स में इन फर्मों को अच्छे मौके दिख रहे हैं। ICICI Prudential AMC का कहना है कि वैल्यूएशन अभी न्यूट्रल रेंज में है।
आगे क्या?
जानकारों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें $100 के पार बनी रहीं, तो Nifty 22,660 तक गिर सकता है। Goldman Sachs का कहना है कि बढ़ती ऊर्जा कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती हैं, जिससे ट्रेड डेफिसिट 2% तक बढ़ सकता है। इन चिंताओं के बीच, बाज़ार की दिशा आगे चलकर कच्चे तेल की कीमतों, वैश्विक भू-राजनीतिक स्थिरता और विदेशी निवेश के प्रवाह पर निर्भर करेगी, जबकि घरेलू मांग और सरकारी पहलों से इसे सहारा मिल सकता है।